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स्टेटक्राफ्ट

जब इतिहास में पहली बार अमेरिका में निकला था मॉब लिंचिंग के खिलाफ शांति मार्च

चंद्रभूषण।

पिछले कुछ सालों से मॉब लिंचिंग शब्द अखबारों के पन्नों से लेकर संसद के गलियारे तक गूंज रहा है. नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ संसद में पेश अविश्वास प्रस्ताव पर बहस के दौरान गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था. “भारत में पहली मॉब लिंचिंग 1984 में सिक्ख समुदाय की हुई थी. जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेसियों ने पूरे देश में हिंसक उत्पात मचाया था.”

राजनाथ‌ सिंह के उपरोक्त बयान का संदर्भ था, विपक्ष का गो-तस्करी के शक में हो रही मॉब लिंचिंग पर सरकार को घेरना.

अपको बता दें कि मॉब लिंचिंग की भयावहता इस कदर है कि सुप्रीम कोर्ट ने भी सरकार को इससे निपटने के लिए संसद से जल्द ही कानून बनाने का सलाह दिया.

आज मैं मॉब लिंचिंग की बात क्यों कर रहा हूं. लोकसभा चुनाव 2019 में विपक्ष सत्ता पक्ष को घेरने के लिए मॉब लिंचिंग के मुद्दे को भी कभी-कभी कुरेद रही है. अल्पसंख्यक समुदाय के मतों को अपने पक्ष में लाने के लिए विपक्ष इसको जोर-शोर से उठाती रही है. फिलहाल मैं इतिहास के पन्ने कुरेदते हुए आपको लगभग 102 साल पहले 18 जुलाई को अमेरिका में हुई एक घटना के बारे में बताना चाहूंगा. उस दिन साल 1917 में न्यूयार्क में हजारों अश्वेत लोगों जिसमें बच्चे, महिलायें, बूढ़े और जवान सभी शामिल थे, अपने समुदाय‌ के खिलाफ हो रही मॉब लिंचिंग के विरोध में एक शांति मार्च निकाला था.

अमेरिका में उस दौरान अश्वेतों के खिलाफ हिंसा अपने चरम पर थी. दक्षिण अमेरिकी शहरों में तो हजारों श्वेत लोगों के सामने ही अश्वेतों को मौत के घाट उतारा जा रहा था.

स्थिति बहुत खतरनाक हो गई थी. जब सेंट लुइस शहर में कुछ हफ्ते पहले ही काले और गोरे मजदूरों के बीच तनाव बढ़ गया था.

और उसके बाद सेंट लुइस की सड़कों पर जो हुआ, वह मानवता के लिए शर्मसार करने वाला था. 24 घंटे में श्वेतों की भीड़ ने हर उस अश्वेत को मारा जो उनके सामने आया, बिना किसी उम्र और लिंग की परवाह किये और घरों में आग भी लगा दिये गए.

मॉब लिंचिंग के कुछ कारण

येल विश्वविद्यालय के पुस्तकालय के दस्तावेजों के अनुसार उस दिन मॉब लिंचिंग में 200 अश्वेत मारे गए थे, जबकि 6000 के आसपास अश्वेत भीड़ की हिंसा से बचने के लिए घर छोड़कर भाग गए थे. इस घटना की जड़ को देखें तो पता चलता है कि प्रथम विश्वयुद्ध के कारण फैक्ट्री में काम की प्रकृति बदल रही थी. धातु निर्माण की कंपनियों में नौकरियां घटने लगी थीं वहीं धातु से बनने वाले उत्पादों के निर्माण करने वाली फैक्ट्रियों में मौके बढ़ गए थे. जिससे अफ्रीकी-अमेरिकी समुदाय के मजदूर परिवार बड़ी संख्या दक्षिण से उत्तर के शहरों में पलायन कर रहे थे.

इसका फायदा उठाते हुए फैक्ट्री मालिकों ने इन असंगठित मजदूरों को नौकरी देना शुरू कर दिया. श्वेत मजदूर इसका विरोध कर रहे थे. और असंतोष की इस लहर ने एक छोटी सी अपराधिक घटना के बाद श्वतों को अश्वेतों के खून का प्यासा बना दिया.

अश्वेतों के संगठन नेशनल एसोसिएशन फॉर द एडवांसमेंट ऑफ कलर्ड पीपल (NAACP) ने सेंट लुइस नरसंहार के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए और देश भर में अश्वेतों के अधिकारों की रक्षा और और उनके जानमाल की सुरक्षा के लिए शांति मार्च निकाला. अफ्रिकी-अमेरिकियों का अमेरिका में अपने अधिकारों की रक्षा के लिए यह पहला विरोध प्रदर्शन था.

मियामी हेराल्ड के अनुसार इस शांति मार्च में सबसे पहली कतार में बच्चे और महिलाएं सफेद कपड़ों में थी जो देश में हो रही नस्लवादी हमलों में अपनी बेगुनाही को साबित कर रहा था वहीं पिछली कतारों में पुरूष गाढ़ें काले रंग के शूट में थे जिससे वह साबित करना चाहते थे कि वह अपने अधिकारियों के लिए आवाज उठायेंगे.

अमेरिका में लिंचिंग संस्कृति की शुरूआत

इस शांति मार्च ने तत्काल तो कोई समाधान नहीं निकाला लेकिन आने वाले दशकों में अश्वेत लोगों के विरोध का यह आदर्श जरूर बना. हालांकी यह बात भी कम सोचने लायक नहीं कि आज भी वहां छिटपुट नस्लवादी हमले होते रहते हैं, इस सच्चाई के बाद भी कि अमेरिका में अपनी एक तिहाई ही जनसंख्या रखने वाले अश्वेत समुदाय के बराक ओबामा को वे दो बार अपना राष्ट्रपति चुन चुके हैं.

भारत में मॉब लिंचिंग के उदाहरण

मॉब लिंचिग की इस ऐतिहासिक घटना को हम अपने भारत के संदर्भ में देखें तो यहां कारण अलग हैं लेकिन स्वरूप वही है. पहलू खान, रकबर आदि सिर्फ इसलिए मार दिये जाते हैं कि क्योंकि उनपर गो-तस्करी का शक कुछ धर्म के ठेकेदारों को हो जाता है. गो-तस्करी के खिलाफ हमारे यहां पर्याप्त कानून हैं लेकिन धर्म की आड़ में किसी की राजनीति चमकाने के लिए यह लठैत सरेआम हत्यायें करते हैं. इसके लिए उन्हे बस दो ही चिज देखनी होती है एक आदमी का मुसलमान होना और दूसरा उसके पास गाय होना.

हालांकी मुस्लिम पहचान वाली शर्त धीरे-धीरे धूमिल पड़ती जा रही है क्योंकि कुछ ऐसे मामले भी देखे गए हैं जहां गैर मुस्लिम पहचान वाले लोगों पर भी गाय के साथ गाड़ियों में पकड़े जाने पर हमला किया गया है.

सरकार इसे 1984 और चाहे तो महाभारत वाले अभिमन्यु के चक्रव्युह में घेरकर मारने तक खिंच कर ले जा सकती है. वह भी केवल यह साबित करने के लिए कि उसके कार्यकाल में ही मॉब लिंचिंग नहीं हो रही है.

सरकार जब करेगी तब करेगी उससे पहले समाज को 1917 के शांति मार्च वाले नियत से एकजूट होना होगा और अफवाहों तथा इन ठेकेदारों का सार्वजनिक बहिष्कार करना होगा.

DPILLAR