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कला-साहित्य-सिनेमा

एम रमन गिरि।

विक्रम चंद्रा के नॉवेल पर आधारित  सेक्रेड गेम्स (नेटफ्लिक्स की प्रचलित भारतीय सीरीज) की कहानी भले ही बीते कल के सामाजिक राजनीतिक पृष्ठभूमि लिखी गयी हो , पर किरदारों के संवाद कहानी को मौजूदा दौर में लाकर खड़ा कर देता है.

कहानी में मुख्य भूमिका में कौन है ये पता लगाना मुश्किल है क्योंकि कहानी में छोटे छोटे पात्रों को जिस तरीक़े से क़िरदार बनाया गया है, वो अपने आप में दिलचस्प है. 

मसलन गणेशगायतोंडे (नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी)  का किरदार हो या सरताज़ (सैफ़ अली खान)  या अंजली माथुर( राधिका आप्टे)  या फिर मुंबई शहर. हर कोई अपनी कहानी का हीरो दिखता है.

कहानी के मायथोलॉजिकल संवाद भी कहानी को नए सिरे से गढ़ते हैं क्रिएटिव लिबर्टी का पूरा फायदा उन तमाम रूढ़िवादी परंपरा एवं विचारों को समझने के लिए लिया गया है जिन्हें अक़्सर लोग फिल्मों में दिखाने से कतराते रहें हैं.

 कहानी के क़िरदार गणेश गायतोंडे ने जिस बेबाकी से धर्म को परिभाषित किया है वो आपको सोचने पर मजबूर कर देगा. सीरीज़ के सातवें पार्ट रुद्र में जहां गणेश गायतोंडे की मुलाकात पहली बार उसके तीसरे बाप त्रिवेदी से होती है, बात बात में वो उससे पूछता है, 

” लगता है आपने बाल्मीकि की रामायण पढ़ी है , लेकिन मैंने तो रामानंद सागर की ही रामायण देखी है”

पूरे दृश्य में जिस तरीक़े से ये संवाद आता है, आपको सोचने पे मजबूर करेगा कि हमारे जेनरेशन के ज्यादे लोगों की समझ तो सिर्फ रामानंद सागर की ही रामायण देखकर बनी है.

अगर लेखन की बात हो तो वरुण ग्रोवर औऱ उनकी टीम ने जिस तरीके से कहानी के अतीत को वर्तमान के साथ पिरोया है, उससे लगता ही नहीं की 1983 की घटना है अथवा 1992 का बाबरी मस्जिद विध्वंस. 

 सब बीते कल की बातें लगती हैं.  कहानी में वरुण ग्रोवर ने जिस तरीक़े से सीरीज़ के नामकरण किये हों या फिर मंडला के प्रतीक का या फ़िर धर्म के अंतर्द्वंद्व का, आपके  मायथोलॉजिकल समझ को नए सिरे से गढ़ता है. 

कहानी की शुरुआत ही एक बेहद बोल्ड डायलॉग से होती है. 

“भगवान को मानते हो ..?”

अग़र डायरेक्शन की बात करें तो विक्रमादित्य मोटवानी का डायरेक्शन, संवाद और किरदारों की संवेदनशीलता को और भी परिपक्व बनाता है. 

मुख्य तौर पर सरताज सिंह और अंजली माथुर एवं पुलिस कांस्टेबल केतकर के संवाद को जीतने बारीकी से पिरोया गया है वो पूरे मुंबई शहर को एक क़िरदार की तरह लाकर खड़ा करता है. 

नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी,
गणेशगायतोंडे  के किरदार में

दूसरे कहानी के तथाकथित मुख्यपात्र गणेशगायतोंडे  के किरदार को अनुराग कश्यप ने अपने चितपरिचित अंदाज़  में पिरोया है. 

 नएपन के तौर पर इस बार संवाद लेखन  को जिस साफगोई से फिल्माया गया है वो आपको खुद अनुराग कश्यप के एक नए आयाम से परिचित कराएगा. 

 कहानी के कई सेक्स सीन से आप असहज हो सकते हैं या फिर अक्सेसिवे क्रिएटिव लिबर्टी कह सकतें हैं.  पर कहानी के संवाद उन दृश्यों को पूरी तरीके से जस्टिफाई करते हैं. 

सीरीज़ के एक भाग में कहानी का किरदार पुलिस कांस्टेबल केतकर अपने बीवी के साथ रात में संभोग की अवस्था मे भी अपने साहब सरताज सिंह का फ़ोन उठाता है. 

इस पूरे दृश्य को जिस तरीके से लिया गया है उसमें आप कहीं से असहज़ नहीं होंगे , वहीं दूसरे अनुराग कश्यप के किरदार गणेश गायतोंडे या फिर महिला क़िरदारों को जिस तरीके से सेक्स सीन करते हुए दिखाया गया है , वो आपको  अक्सेसिव क्रिएटिव लिबर्टी लग सकती है. 

कहने का मतलब यह है कि कहानी के छोटे छोटे क़िरदारों को जिस बारीकी से प्रस्तुत किया गया है वो आपको कहानी को और करीब से जीने का मौका देते हैं. 

फ़िलहाल  कहानी अपने पहले सीज़न के आठ भागों को लेकर आई है. जिसने ब~मुक्कमल आपको एक सस्पेंस पर लाकर खड़ा कर दिया है. जिससे कि आप अगले हिस्से को लेकर उत्सुक रहें. जो उस कहानी की सफलता को बयां करती हैं. 

जैसा कि भरतमुनि के नाट्य शास्त्र में भी  कहा गया है कि कहानी का काम ही आपकी जिजीविषा को जागृत करना भर है ताकि उस उत्सुकता से उत्पन्न रस का भोग आप स्वयं कर सकें . 
ये कहानी के कुछ एक दृश्य हैं जो जहन में आकर अटक से जाते हैं, 

एपिसोड 1 : अश्वस्थामा –

                                    भगवान को मानते हैं आप , भगवान को ( ….) फ़र्क पड़ता है.
उस दिन अपुन भाग रहा था अपने कल से, अपने आज से, अपने शहर से अपने गांव और अपनी माँ से, ऐसे, जैसे पिछले छ जन्म से अपनी माँ से नहीं मिला था, तब समझ नहीं पाया था मैं की मेरा धर्म क्या है. मेरी माँ या मेरा बाप. 
इस देश में जो काम हिन्दू की थाली में एक हड्डी और मुसलमान के लिए एक सुअर कर सकता है ना, वो काम बड़े से बड़ा नेता या ताक़तवर इंसान भी नहीं कर सकता.

एपिसोड 7 : रुद्र

धर्म धंधा सिर्फ बड़े और ताकतवर लोगों के लिए है गरीब के लिए धर्म का सिर्फ एकही मतलब है  आज़ादी, गरीब भगवान को इसलिए नहीं मानता कि वो कमज़ोर है, बल्कि भगवान से उनको ताक़त मिलता है और मंदिर एकमात्र जगह जहां वो सबके बराबर में खड़ा रहता.

 और गणपति के सामने वो सिर्फ़ इसलिए भी नहीं नाचता की गणपति से उसको प्यार है. बल्कि वही एक दिन है जिसमें वो अपने को आजाद समझता है और ऐसा करने से उसको कोई रोकने वाला नहीं है, और उस दिन सब उसे इंसान की नज़र से देखते हैं. 

एपिसोड 6 ~ प्रेतकल्प 

                     इस एपिसोड के आख़िर में जब मुम्बई पुलिस कांस्टेबल केतकर की लाश के सामने उसकी बीवी( शालिनी )  रो रही होती है और तभी सरताज की एंट्री होती है, तो वो इस मौत का जिम्मेदार सरताज को ठहराते हुए इस उम्मीद से कहती है, 
शालिनी : सर पता नहीं क्यूँ ये उठ नहीं रहा ,बोलो न उठने को …..हां आप फ़ोन करो जरूर उठाएगा, आपका फ़ोन हमेशा उठाता था चाहे कितने अंदर क्यों न घुसा  हो, हमेशा आपका फ़ोन उठाता थ. 

सरताज : कुछ कह न सका , बस अफ़सोस के आँशु गिर रहे थे  

DPILLAR