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February 18, 2019
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प्रियंका गांधी के भारतीय राजनीति में आने से क्या बदलेगा?


लेखक- नदीम अख्तर (वरिष्ठ पत्रकार एवं भारतीय जन संचार संस्थान नई दिल्ली में फैकल्टी)

भारतीय राजनीति में धमाका हो गया. नेहरू-गांधी परिवार के दूसरे चश्म-ओ-चराग यानी प्रियंका गांधी वाड्रा को आज भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में महासचिव बना दिया गया. यानी प्रियंका गांधी अब कांग्रेस के लिए महज चुनाव प्रचार नहीं करेंगी, अब वो औपचारिक रूप से कांग्रेस के रथ की सारथी हैं और भाई तथा कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ मिलकर 2019 के चुनाव की नैया पार लगाने की अगुवाई करेंगी. सुना है कि प्रियंका अब यूपी में राहुल की सीट अमेठी से लोकसभा चुनाव लड़ेंगी और राहुल कांग्रेस में सर्वोच्च सत्ता के प्रतीक परम्परागत रायबरेली सीट से चुनाव लडेंगे. यानी सोनिया गांधी की सीट अब राहुल की है. मतलब कि कांग्रेस में सत्ता अब नेहरु-गांधी परिवार की चौथी पीढ़ी के सुपुर्द हुई.

आम चुनाव से ऐन पहले कांग्रेस का ये एटम बम बीजेपी के लिए दूसरा बड़ा झटका है. हाल ही में बीजेपी को पहला झटका तब लगा था, जब प्रधानमंत्री बनाने वाले महत्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश में परस्पर दो विरोधी पार्टियों यानी सपा और बसपा ने हाथ मिला लिया और आधी-आधी सीटें आपसे में बांट लीं. बीजेपी इससे घबराई हुई इसलिए है कि लोकसभा सीटों के उपचुनाव में जहां-जहां सपा-बसपा मिलकर लड़े हैं, वहां बीजेपी का पत्ता साफ हो गया है. यानी यूपी के जातीय समीकरण वाली राजनीति में बीजेपी का हिंदुत्व कार्ड और सीएम योगी आदित्यनाथ की ब्रांडिंग भी फेल हो गई. हद तो तब हो गई जब योगी के घर गोरखपुर में बीजेपी पिट गई. सो सपा-बसपा गठबंधन से पटी बीजेपी के लिए कोढ़ में खाज ये हुआ कि अब कांग्रेस ने अपना एक और सेनापति यानी प्रियंका गांधी को मैदान में उतार दिया. दूसरे शब्दों में कहें तो कांग्रेस ने सचिन तेंडुलकर के कद के खिलाड़ी को बैटिंग करने क्रीज पर भेज दिया है. प्रियंका उनके लिए तुरुप का पत्ता थीं, जिसे कांग्रेस ने बाजी में आगे चल दिया. बिसात बिछी हुई है. खेल रोचक हो गया है.

यूं तो प्रियंका गांधी को पार्टी में जिम्मेदारी और पद देने की मांग बहुत पहले से उठती रही है पर ऐसा माना जाता है कि सोनिया गांधी ने राहुल गांधी के पुत्रमोह में प्रियंका को किनारे रखा ताकि राहुल धीरे-धीरे पार्टी पर काबिज हो सकें और अपनी पहचान बना सकें.

सत्ताधारी बीजेपी और उसके सहयोगी राहुल को जितना -पप्पू- यानी नौसिखिया बोलते थे, कांग्रेसियों के दिल में उतनी ही तेज हिलोरें उठती थीं कि काश !! प्रियंका को सामने किया जाता ताकि पार्टी बीजेपी को टक्कर दे सके. आखिरकार राहुल ने धीरे-धीरे जनता का विश्वास जीत ही लिया और हर मौके पर प्रियंका उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी नजर आईं. दिल्ली में विधानसभा चुनाव बुरी तरह हारने के बाद राहुल गांधी हिम्मत दिखाकर जब मीडिया से रूबरु होने आए तो प्रियंका गांधी उनकी बगल में खड़ी थीं. एक बहन के नाते भी और नैतिक समर्थन देने के हवाले से भी. पर हर बार कांग्रेस पार्टी इस सवाल से कन्नी काट लेती थी कि प्रियंका गांधी पार्टी में कमान कब संभालेगी.

कांग्रेस संक्रमण काल से गुजर रही है!

आज कई पुराने और युवा कांग्रेसियों के दिल के अरमान निकल गए. और क्या खूब निकले. वैसे समय में जब राहुल ने हिंदी बेल्ट के तीन राज्यों में अपने बूते झंडा गाड़कर तीनों जगह से बीजेपी को सत्ता से उखाड़ दिया, पप्पू की छवि को पलट दिया और ये बता दिया कि वह जनता से वोट मांगकर सीएम बना सकते हैं, और ये कि कांग्रेस अभी मरी नहीं है, संक्रमण काल से गुजकर उनके नेतृत्व में फिर जिंदा हो रही है, वैसे में लोकसभा चुनाव के ठीक पहले प्रियंका को पार्टी महासचिव बनाना और चुनाव लड़वाना कांग्रेस का एक अचूक मास्टरस्ट्रोक है.

मुझे हिंदी फिल्म -जो जीता वही सिकंदर- का वो आखिरी सीन याद आ गया, जब रेस में फिनिशिंग के ठीक करीब पहुंचने पे आमिर खान ने चौथा और अंतिम गियर लगाकर रेस जीत ली. बाकी सब लोग देखते रह गए. कांग्रेस ने भी अपना आखिरी गियर लगा दिया है. यानी संदेश ये है कि लोकसभा में 2019 का चुनाव जीतने के लिए अब वह कोई कोर-कसर नहीं छोड़ेगी. ये चुनाव बीजेपी और कांग्रेस दोनों के लिए अब Do Or Die बन चुका है.

क्या प्रियंका में दिखते हैं इंदिरा गांधी के अक्स ?

प्रियंका गांधी से बीजेपी को डरना चाहिए. इसलिए कि जनता उनमें इंदिरा गांधी का अक्स देखती है. बिल्कुल अपनी दादी सी नाक, वैसे ही छोटे-छोटे बाल और जबरदस्त वाकपटु व हाजिरजवाब. अगर आपने कभी प्रियंका गांधी का भाषण या टीभी चैनलों से उनकी बातचीत सुनी होगी तो पाया होगा कि वह जबरदस्त आक्रामक हैं. जिस तरह मोदी जी आक्रामक होकर अपनी बात कहते हैं, प्रियंका उसी अंदाज में उनको सीधी टक्कर दे सकती हैं.

दूसरी बात ये कि वह महिला हैं और अपना दादी इंदिरा गांधी की तरह तुरंत जनता से कनेक्ट करती हैं. उनसे हिलमिल जाती हैं. यानी देश की आधी आबादी का रुझान प्रियंका अपनी तरफ खींच सकती है. बीजेपी में उनकी तोड़ का कोई नहीं है. एक और बात प्रियंका के फेवर में जाती है कि उनमें ग्लैमर भी है.

क्यों जरूरी है राजनीति में ग्लैमर ?

आप चौंकेंगे कि राजनीति में ग्लैमर का क्या काम ? पर ये जबरदस्त फैक्टर है जो दुनिया के हर देश की राजनीति में बहुत सटीक और महीन तरीके से काम करता है. अमेरिका जैसे देश में तो इस बात पर खास ध्यान दिया जाता है कि राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार में ग्लैमर कितना है. उनके पहनावे से लेकर बोलने और पूरी की पूरी बॉडी लैंग्वेज का महत्व होता है और जनता इस बात पर भी उनका आंकलन करती है कि राष्ट्रपति का संपूर्ण व्यक्तत्व कैसा है !! तभी वोट देती है.

हमारे पीएम मोदी जी इस बात का महत्व बखूबी समझते हैं और पीएम बनने के बाद उन्होंने अपने बाहरी लुक पर भी बहुत काम किया है. आप पीएम बनने से पहले की उनकी तस्वीरें देख लीजिए और पीएम बनने के बाद की उनकी पर्सनेलिटी. अंतर आपको खुद समझ आ जाएगा. इसी चक्कर में अमेरिकी राष्ट्रपति के स्वागत में वे लाखों का वो सूट पहनकर पहुंच गए, जिस पर उनका नाम लिखा था. पर विपक्ष ने जब इसे सूट-बूट वाली सरकार कहकर मोदी पर निशाना साधना शुरु किया तो मोदी जी अपने कुरते और चूड़ीदार पायजामा के पुराने स्टाइल में वापस आ गए.

दूसरा उदाहरण ये है कि इसी ग्लैमर फैक्टर के चलते लगभग सभी राजनीतिक पार्टियां फिल्मी सितारों को अपनी चुनावी सभी में भीड़ जुटाने और वोटरों को लुभाने के लिए बुलाती रही हैं. सो राजनीति और ग्लैमर के इस तड़के पर प्रियंका एकदम सटीक बैठती हैं. मेरी समझ से भारतीय राजनीति में अभी कोई ऐसा नेता या नेत्री नहीं है, जिसमें प्रियंका जितना ग्लैमर फैक्टर हो. बीजेपी की स्मृति ईरानी शुरु-शुरु में इसी ग्लैमर फैक्टर के चलते राजनीति में कामयाब भी हुईं पर अब उनका जलवा बहुत फीका हो चुका है.

बहरहाल, मुख्यतौर पर नेहरू-गांधी परिवार की विरासत रही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में प्रियंका गांधी के पद और जिम्मेदारी संभालते ही भारतीय राजनीति में नए समीकरण बनेंगे. सुना है कि उन्हें पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभार भी दिया गया है, जिसका सीधा मतलब ये है कि कांग्रेस यूपी में खुद को रेस से बाहर नहीं मान रही. इसका अर्थ ये हुआ कि हो सकता है के आने वाले समय में सपा-बसपा के गठबंधन में कांग्रेस भी शामिल हो जाए और तीनों पार्टियां मिलकर यूपी में लोकसभा चुनाव लड़े. राजनीति में कुछ भी संभव है. और अगर ऐसा नहीं हुआ तो कांग्रेस यूपी में बहुत टैक्टिकल चुनाव लड़ेगी यानी जहां-जहां सपा और बसपा के कमजोर उम्मीदवार होंगे, वहीं अपना मजबूत कैंडिडेट उतारेगी ताकि वोट कांग्रेस और सपा-बसपा गठबंधन में ना बंटे और बीजेपी को फायदा ना हो जाए. सपा-बसपा गठबंधन भी इसी तर्ज पे कांग्रेस को वॉकओवर देगा और जहां-जहां कांग्रेस मजबूत होगी, वहां अपना कमजोर प्रत्याशी उतारेगा. ये तीनों पार्टियों की एक भीतरी अंडरस्टैंडिंग बन सकती है क्योंकि अगर कांग्रेस, सपा-बसपा और बीजेपी तीन तरफा मुकाबले में चुनाव मैदान में उतरेंगी तो इसका सीधा फायदा बीजेपी को होगा जो ना कांग्रेस चाहेगी और ना सपा-बसपा गठबंधन.

कांग्रेस कैसे निपटेगी रॉबर्ट वाड्रा फैक्टर से…

आखिर में सबसे महत्वपूर्ण बात. मुझे आशंका है कि कांग्रेस में प्रियंका गांधी वाड्रा को काउंटर करने के लिए बीजेपी उनके पति रॉबर्ट वाड्रा पर निशाना साध सकती है. गांधी परिवार की वही कमजोर कड़ी हैं, जिस पर समय-समय पे राहुल और सोनिया बैकफुट पे आए हैं. इस आदमी ने शायद छोटे से लालच में कांग्रेस पार्टी का बड़ा नुकसान किया है. लेकिन अब लगता है कि कांग्रेस -वाड्रा फैक्टर- से निपटने की एक सोची-समझी रणनीति पर चल रही है.

प्रियंका गांधी वाड्रा अपने पति रॉबर्ट वाड्रा के साथ. फोटो- गूगल

आमतौर पर मीडिया से किनारा करने वाले रॉबर्ट वाड्रा भी अब गजब के मीडिया फ्रेंडली हो गए हैं. तभी तीन राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस जैसे ही चुनाव जीती, उसके अगले ही दिन सुबह-सुबह रॉबर्ट वाड्रा #ANI नामक न्यूज एजेंसी को बुलाते हैं और जॉगिंग करते-करते सरकार पर हमला बोल देते हैं. ठंड में टोपी-टापा पहने हुए रॉबर्ट वाड्रा एकदम आम आदमी लग रहे होते हैं और मीडिया से कहते हैं कि सरकार छापा डालकर उनको परेशान कर रही है. उन्होंने कोई गलत काम नहीं किया. लेकिन वो सरकार से नहीं डरते और डटकर इसका मुकाबला करेंगे. देश छोड़कर नहीं भागेंगे और यहीं रहकर सरकार को एक्सपोज करेंगे. रॉबर्ट वाड्रा इतने पे ही नहीं रुके, एक बाप की व्यथा बताकर उन्होंने इमोशनल कार्ड भी चला. कहा कि उनके दफ्तर पर छापा मारने आए लोगों ने उनके बच्चों की तस्वीर का फ्रेम भी तोड़ दिया….

सो अब बोलिए. कांग्रेस की ये तैयारी कैसी लगी आपको ? रॉबर्ट वाड्रा का वो इंटरव्यू मुझे उसी वक्त खटका था कि ये आदमी इस वक्त ये-ये बात क्यों बोल रहा है ? यानी मेरा अंदाजा सही निकला. ये सब कांग्रेस में प्रियंका को कमान सौंपने की तैयारी का रिहर्सल था. कांग्रेस को मालूम है कि प्रियंका के खुलकर सामने आने पर उसे निस्तेज करने के लिए बीजेपी सबसे पहले उनके पति रॉबर्ट वाड्रा को निशाना बनाएगी. सो रॉबर्ट वा़ड्रा भी अब सिर पर कफन बांधकर मैदान में तैयार है.

मेरी बात लिख के रख लीजिए. बीजेपी और सरकार अब रॉबर्ट वाड्रा पर जितना निशाना साधेगी, उनके यहां जितने छापे पड़ेंगे, कांग्रेस को जनता की उनती ही सहानुभूति मिलेगी. कारण ये है कि हरियाणा से लेकर राजस्थान तक में बीजेपी की सरकार बनी पर बीजेपी ने रॉबर्ट वाड्रा के जमीन घोटाले के आरोपों की जांच पर कुछ नहीं किया. केंद्र में भी बीजेपी की सरकार है और 2014 में अपने हर भाषण में रॉबर्ट वाड्रा को दामादजी कहकर संबोधित करने वाले मोदी जी भी पिछले साढ़े चार सालों में रॉबर्ट वड्रा पर खामोश रहे हैं. सो अब जब चुनाव नजदीक हैं, ऐसे में अगर रॉबर्ट वाड्रा पर निशाना साधा जाता है तो जनता यही समझेगी कि ये सब फर्जी कार्रवाई राजनीतिक नफे-नुकसान के लिए सरकार कर रही है और रॉबर्ट वाड्रा निर्दोष हैं. सो चुनाव में कांग्रेस जनता की इस सहानुभूति का फायदा उठा ले जाएगी और बीजेपी को तगड़ा नुकसान हो जाएगा.

कुल मिलाकर 2019 के चुनाव में दोनों सेनाओं ने यानी कांग्रेस और बीजेपी ने अपनी-अपनी गोटियां मुख्य रूप से सेट कर दी हैं. लड़ाई इन्हीं दोनों के बीच होनी है. क्षेत्रीय पार्टियों से गठबंधन बीजेपी का भी है और कांग्रेस का भी. पर प्रियंका के खुलकर सामने आने से अब वो देशभर में कांग्रेस और अपनी सहयोगी पार्टियों की स्टार प्रचारक होंगी. उनकी भारी डिमांड रहेगी. और आप देखिएगा कि जब मंच से प्रियंका गांधी हमालवर होंगी तो पब्लिक खूब ताली पीटेगी. और ये ताली वोट में भी बदलेगी. लगता है कि प्रियंका ने ये ठान लिया है कि चाहे जो हो जाए, रॉबर्ट वाड्रा को परेशान ही किया जाएगा ना, सह लेंगे पर अबकी बार राहुल को पीएम की कुर्सी के नजदीक पहुंचा देना है.

कहना नहीं होगा कि प्रियंका को जिम्मेदारी मिलने से देशभर के कांग्रेसी कार्यकर्ताओं में जोश और खुशी की लहर है. तीन राज्यों में जीत के बाद कांग्रेस को इसी संजीवनी की तलाश थी, जो आज उसे मिल गई. 2019 अब साधारण मुकबला नहीं होगा. ये कांग्रेस और बीजेपी का भयंकरतम रण होगा. एक तरफ होंगे बुजुर्ग मोदी जी और दूसरी तरफ होंगे दो युवा- राहुल और प्रियंका. साथ रहेंगी मैच्योर सोनिया गांधी. कॉरपोरेट धन इस दफा कांग्रेस को भी देगा और बीजेपी को भी. वह भी रिस्क नहीं लेना चाहता. पता नहीं कौन सत्ता में आ जाए !!! सो मुकाबला जोरदार रहने वाला है. कांग्रेस के लिए ये एक नए काल का आगमन है. भाई-बहन की जोड़ी कमाल कर सकती है. सचमुच कर सकती है. आप देखते रहिए बस !!

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