#Interview: थिएटर वो जिंदगी है जो एक बार शुरु होती है और द-एंड पर जाकर खत्म : संजय मिश्रा

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Team dPILLAR : तब बिहार की गिनती देश के पिछड़े राज्यों की लिस्ट में होती थी. तब सूबे के किसी भी साधारण परिवार के युवा के लिए मुंबई की मायानगरी सपने से कम नहीं थी. और तभी बिहार के छोटे से जिले सहरसा से निकल कर एक युवा अभिनय की बारीकियां सीखने के लिए नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में दाखिला लेता है. जब एक्टर बन जाता है तो लॉस-एंजलिस में जाकर बेस्ट एक्टर का खिताब भी जीत लाता है.

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हम बात फिल्म अदाकार संजय मिश्रा की कर रहे हैं. परिचय अब उनका मोहताज नहीं रहा. क्योंकि गोलमाल के बब्लीजी और मसान के पंडितजी अब सिनेप्रेमियों के दिल में इस तरह बस गए हैं कि प्रोड्यूसर और डायरेक्टर अपनी मल्टी स्टारर फिल्म में भी संजय मिश्रा को कास्ट करने में नहीं हिचकिचा रहे हैं. जाहिर है संजय मिश्रा को इस बुलंदी तक पुंहचने में बहुत संघर्ष करने पड़े होंगे. जैसे ही बात संघर्ष की आती है तो संजय मिश्रा तपाक से बोल पड़ते हैं-

“बिना संघर्ष के किसी ने कुछ हासिल किया है क्या? यदि किसी ने किया है तो लिख कर रख लीजिए वो उसका कतई नहीं है. कहीं ना कहीं से मिला है.”

पिछले हफ्ते पटना आए  फिल्म अभिनेता संजय मिश्रा से Team dPILLAR के साथी अभिषेक मिश्रा ने बात की. पेश है बातचीत के अंश-

एक कार्यक्रम में शिरकत करने पटना आए संजय मिश्रा, अभिषेक कुमार मिश्रा के साथ, PHOTO/DPILLAR
एक कार्यक्रम में शिरकत करने पटना आए संजय मिश्रा, अभिषेक कुमार मिश्रा के साथ, PHOTO/DPILLAR


सवाल
जब भी आपसे बात की शुरूआत करते हैं सबसे पहले गोलमाल की याद आती है, जिसमें हर चीज की स्पेलिंग आप चेंज कर के बोलते हैं. क्या ये स्क्रिप्टेड था या फिर अपनेआप आया!  क्या है इसके पीछे की कहानी?

जवाब – गोलमाल के बारे में जब भी कुछ बात करें तो गोलमाल फर्स्ट बड़ा रिलेट होता है. उसमें मैं कहता हूँ, जय मदर मेरी कि मुझे अपने मां की जय करनी है. फिर धीरे-धीरे राइटर्स इस चीज को इनवॉल्व करते चले गए. जो लास्ट गोलमाल आते आते जीएसटी घोस्ट हो गया. हर चीज लिखी नहीं जा सकती. कुछ चीजें सिचुएशनल और टेंशन से अपनेआप हो जाती हैं. जैसे ढोंढू जस चिल्ल हो गया.

सवाल आप अभी ड्राई-स्टेट में हैं. हाल में आपने शराब के एक ब्रांड के लिए शॉर्ट मूवी की है, तो कैसा लग रहा है अभी आपको ड्राई स्टेट में?

जवाब- ड्राई-स्टेट के नाम पर लोगों को डराया जा रहा है. गुजरात भी ड्राई स्टेट है. लेकिन वहां इसका हौवा नहीं बनाया गया है, ना ही ऐसे डराया जाता है. फ्लाइट में आते समय अनाउंसमेंट्स ऐसे होते हैं कि आप ड्राई-स्टेट में हैं ऐसा हो जाएगा-वैसा हो जाएगा. उतरने के बाद सिक्योरिटी वाले भी ऐसे देखते हैं कि आप मरें या जिएं, हम बोतल अंदर नहीं जाने देंगे.

मतलब इतना डरावना क्यों बनाना? ऐसा लगता है कि आप अपराधी बन के उतरते हैं और आपसे कहा जा रहा हो कि लो बेटा, इलायची पहले ही खा लो. अब ट्रेन के आगे कूद कर लोग आत्महत्या कर लेते हैं तो क्या ट्रेन चलना बंद कर देती है. हमारा काम है लोगों को जागरूक करना, ना कि डराना.

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 सवाल- एक बड़ा ही कॉमन सवाल आपसे पूछा जाता होगा. थिएटर और सिनेमा में कौन आपके ज्यादा करीब है?

जवाब- मेरे लिए मेरे सबसे करीब है एक्टिंग. अब वो थिएटर की एक्टिंग हो या सिनेमा की. अब अंतर दोनों के फॉर्मेट में है. थिएटर में आपको संवाद ऐसे बोलने होते हैं कि आखिरी पंक्ति में बैठे हुए को भी वो सुनाई दे सके. आपकी भंगिमाएं उसके समझ में आए, सिनेमा में उसके लिए लेंसेस लगे होते हैं.

सवाल- तो ज्यादा चैलेंजिंग आपके लिए क्या है, थिएटर या सिनेमा.

जवाब–  थिएटर. थिएटर ज़िंदगी है जो एक बार शुरू होती है तो द एंड पर जाकर खत्म होती है. और सिनेमा ज़िंदगी को साइंटिफिक तरीके से रिप्रेजेंट करने का तरीका होता है.

 

 

सवाल- पटना के रंगकर्मियों के हालात के बारे में आपकी प्रतिक्रिया क्या है?

जवाब- ये हालात जो अभी हैं, वो आज से नहीं हैं. जब मैं यहां थिएटर करता था, ये हालात तब से ही हैं. सवाल ये है कि हम हिन्दी वर्ग के दर्शक अपने घरों से निकल कर नहीं आते हैं नाटक देखने.

रंगकर्मी तो अपना काम कर रहे हैं. हम सिनेमाहॉल में नहीं जाते हैं सिनेमा देखने. वो एक कल्चर था जहाँ हम सब पूरे परिवार के साथ जाते थे सिनेमा देखने. वो कल्चर अब मोबाइल में सिमट कर रह गया है. इतनी खूबसूरत चीजें जो हमारे लिए फ्री में उपलब्ध हैं, जहां से आपको सीखने को मिलता है, वहां हम जाते ही नहीं हैं. तो रंगकर्मियों की दुर्दशा तो होगी ही.

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सवाल- आपने एक बार कहा था एक हीरो बूढ़ा हो सकता है, लेकिन एक कलाकार बूढ़ा नहीं होता? इसका क्या लॉजिक है सर?

जवाब- हीरो जो हमारे यहां शब्द है ना, वो इस तरह है कि जब तक आप फीट-फाट, अस्सी घाट हैं, तब तक सब सही है. अब एक मौसा जी के उमर का आदमी हीरोइन के साथ रोमांस करेगा तो कौन देखना पसंद करेगा. इसलिए एक हीरो बूढ़ा हो सकता है लेकिन उसके अंदर का जो कलाकार है वो कभी बूढ़ा नहीं होता. वो जैसा अपनी जवानी में था, वैसा ही हमेशा रहता है.

सवाल–  नए लड़कों के लिए क्या कहेंगे?

जवाब-  सबके लिए यही कहूंगा कि भारतीय हो, भारतीय रहो. अपनी ज़मीन से हमेशा जुड़े रहो, क्योंकि जो अपनी ज़मीन छोड़ देता है बाकी सब चीजें उसे छोड़ देती हैं.

 

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