#RIP केदारनाथ सिंह : मैं उठूंगा और चल दूंगा उससे मिलने, जिससे वादा है कि मिलूंगा

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Team dPILLAR : “और एक सुबह मैं उठूंगा. मैं उठूंगा पृथ्वी समेत. जल और कच्छप समेत मैं उठूंगा. मैं उठूंगा और चल दूंगा, उससे मिलने, जिससे वादा है कि मिलूंगा ” आखिरकार केदारनाथ सिंह इस धरती को छोड़ कर चले गए.

नए जमाने की हिंदी और वर्तमान दौर के सबसे लोकप्रिय तथा सराहे जाने वाले कवियों में एक केदारनाथ सिंह का आज शाम नई दिल्ली में निधन हो गया है. दिल्ली के एम्स अस्पताल में भर्ती केदारनाथ सिंह के निधन की खबर से साहित्य जगत स्तब्ध है.

पिछले कई दिनों से केदारनाथ सिंह को निमोनिया की शिकायत थी. तबीयत बिगड़ने पर उन्हें एम्स में भर्ती कराया गया था. इलाज के दौरान आज सोमवार की रात तकरीबन पौने नौ बजे उन्होंने अंतिम सांस ली. पारिवारिक सूत्रों के मुताबिक 85 साल के केदारनाथ सिंह का अंतिम संस्कार मंगलवार को दिल्ली के लोधी रोड स्थित श्मशान घाट पर किया जाएगा।

केदारनाथ सिंह का जन्म एक जुलाई 1934 में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के चकिया गांव में हुआ था. उन्होंने बनारस विश्वविद्यालय से 1956 में हिन्दी में एमए और 1964 में पीएचडी की डिग्री ली. जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में भारतीय भाषा केंद्र में बतौर आचार्य और अध्यक्ष पद पर भी उन्होंने अपनी सेवाएं दी थी.

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केदारनाथ सिंह को वर्ष 2013 में 49 वें ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजा गया था. यह पुरस्कार पाने वाले वे हिन्दी के 10 वें लेखक थे.

केदारनाथ सिंह के निधन की सूचना आते ही सोशल मीडिया पर उनके चाहने वाले अपने-अपने तरीके से श्रद्धांजलि दे रहे हैं. कई ने केदारनाथ सिंह से जुड़े अपने संस्मरणों को भी साझा किया है.

लप्रेक श्रृंखला की पुस्तक इश्क में माटी सोना के लेखक गिरिन्द्र नाथ झा ने अपने फेसबुक टाइमलाइन पर लिखा है-

“आपसे पिछले साल भुवनेश्वर में मुलाक़ात हुई थी. रात में भोजन के बाद आपसे बात हुई. सत्यानंद निरूपम भाईजी के ज़रिए आपसे मिला.

उस रात आपकी कही यह बात अभी भी मन के नोटबुक में दर्ज है कविवर –

“ हमें अपने समय के सवालों से उलझना और फिर बेहतरी की उम्मीद भी रखना होगा…”

लेकिन उस मुलाक़ात में भी हम आपसे आपकी यह कविता न सुन सके, मेरी सबसे प्रिय कविता-

“मुझे आदमी का सड़क पार करना

हमेशा अच्छा लगता है

क्योंकि इस तरह

एक उम्मीद – सी होती है

कि दुनिया जो इस तरफ है

शायद उससे कुछ बेहतर हो

सड़क के उस तरफ।”

 

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केदारनाथ सिंह चर्चित कविता संकलन ‘तीसरा सप्तक’ के सहयोगी कवियों में से एक थे. मूल रूप से हिंदी में लिखने वाले सिंह की कविताओं के अनुवाद लगभग सभी प्रमुख भारतीय भाषाओं के अलावा अंग्रेजी, स्पेनिश, रूसी, जर्मन और हंगेरियन आदि विदेशी भाषाओं में भी हुए हैं. केदारनाथ सिंह के बारे में ऐसा कहा जाता है कि वे अपने समय के सबसे महंगे कवि भी थी. जिन्होंने कविता पाठ के लिए दुनिया के अनेक देशों की यात्राएं की थी.

केदारनाथ सिंह के कुछ कविता संग्रह हैं :  अभी बिल्कुल अभी, जमीन पक रही है, यहां से देखो, बाघ, अकाल में सारस, उत्तर कबीर और अन्य कविताएं, तालस्ताय और साइकिल.

DPILLAR