देश की पहली महिला टीचर को सलाम

आज की ख़बर खिड़की के पार स्वास्थ्य और शिक्षा

सुमित चौहान :  क्या आप जानते हैं कि भारत का पहला गर्ल्स स्कूल किसने और कब खोला था?आज भारत की महिलाएं हर क्षेत्र में अपनी सफलता और काबिलियत के झंडे गाढ़ रही हैं, लेकिन इन महिलाओं को इस मुकाम पर पहुंचाने की नींव रखने वाली कौन हैं? जवाब है सावित्री बाई फुले. भारत में महिला सशक्तिकरण का सबसे बड़ा नाम अगर कोई है तो वो हैं सावित्री बाई फुले.

सावित्री बाई फुले एक ऐसा नाम जिसे जातीय नफरत और लैंगिक असानता का किचड़ भी मैला नहीं कर सका और उन्होंने महिला शिक्षा की ऐसी अलख जगाई जो आज क्रांति का रूप ले चुकी है.

सावित्री बाई फूले का ज्योतिबा फूले के साथ
सावित्री बाई फूले का ज्योतिबा फूले के साथ

कौन हैं सावित्री बाई फुले ?

आज सावित्री बाई फुले की पुण्यतिथि है. 10 मार्च 1897 को उन्होंने हमेशा के लिए इस दुनिया को अलविदा कह दिया था लेकिन आज उनके योगदान को पूरी दुनिया सलाम करती है.

3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के एक छोटे से गांव में जन्मीं सावित्री बाई की महज 9 साल की उम्र में शादी कर दी गई थी. 12 साल के ज्योतिबा फुले उनके जीवन साथी बनें थे. बचपन में एक-दूसरे का हाथ संभालने वाला फुले दंपत्ति आज एक मिसाल है.

शादी के वक्त सावित्री बाई पढ़ी-लिखी नहीं थी क्योंकि उस समय के हिंदू समाज में दलित महिलाओं के लिए पढ़ना-लिखना मुमकिन नहीं था. लेकिन सावित्री बाई में पढ़ने की खूब ललक थी, उनकी इसी ललक को देखते हुए उनके पति ज्योतिबा फुले ने उन्हें अक्षर ज्ञान कराया.

धीरे-धीरे सावित्री बाई पढ़ना-लिखना सीख गईं और उन्होंने अनेकों किताबों को पढ़ डाला. शिक्षा की ज्योति जलने के बाद सावित्री बाई ने बाकी महिलाओं और लड़कियों के  जीवन में रोशनी लाने का फैसला लिया, उनके इस फैसले में ज्योतिबा फुले ने भरपूर समर्थन दिया.

कहां और कब खुला देश का पहला गर्ल्स स्कूल ?

देश का पहला गर्ल्स स्कूल महाराष्ट्र के पुणे में खोला गया था. सावित्री बाई फुले और ज्योतिबा फुले ने हर जाति की लड़कियों के लिए स्कूल के दरवाजे खोल दिये. इस तरह सावित्री बाई फुले देश की पहली शिक्षिका बनीं.

देश की दूसरी शिक्षिका का नाम फातिमा शेख है. फातिमा शेख सावित्री बाई की दोस्त थीं और उनके स्कूल में छात्राओं को पढ़ाती थी. फुले दंपत्ति ने पुणे और उसके आसपास ऐसे कुल 18 स्कूल खोले. इन स्कूलों में किसी के साथ जातीय भेदभाव नहीं किया जाता था और एक अच्छे इंसान की नींव रखी जाती थी.

कीचड़ भी सावित्री बाई को नहीं रोक पाया

फुले दंपत्ति के लिए स्कूल खोलना आसान काम नहीं था. पहले परिवार और फिर समाज के ठेकेदारों ने उनके रास्ते में तमाम मुश्किलें खड़ी की लेकिन फुले दंपत्ति का हौसला नहीं डगमगाया. सावित्री बाई क्योंकि दलित थी इसलिये ब्राह्मणवादी मानसिकता के लोग उन्हें बहुत परेशान करते थे.

सावित्री बाई जब स्कूल में पढ़ाने जाती तो कुछ दुष्ट ब्राह्मणवादी लोग उनपर गोबर और कीचड़ फेंक दिया करते थे. अमूमन ये रोज का रूटीन था इसलिये सावित्री बाई बैग में एक एक्स्ट्रा साड़ी रखकर ले जाती थीं. स्कूल पहुंचने पर सावित्री बाई नहाती और दूसरी साड़ी पहनकर छात्राओं को पढ़ाने में जुटे जाती. अगले दिन फिर वही गोबर और कीचड़ उनका इंतजार कर रहा होता लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी.

एक बार एक दुष्ट ब्राह्मणवादी ने रास्ते में सावित्री बाई का हाथ पकड़ लिया था, इसपर सावित्री बाई को इतना गुस्सा आया कि उन्होंने उस दुष्ट व्यक्ति को जोरदार थप्पड़ जड़ दिया. उसके बाद से वो आदमी कभी उनके रास्ते में नहीं आया.

फुले दंपत्ति ने ना सिर्फ शिक्षा बल्कि विधवा पुनर्विवाह, अनाथ बच्चों के लिए अनाथालय और असहाय महिलाओं के लिए शेल्टर होम्स भी खोले. उस समय के दकियानूसी समाज और जातिवाद से जकड़े समाज की नींव हिलाने में फुले दंपत्ति ने अपना सबकुछ कुर्बान कर दिया. उन्होंने इसे अपना मिशन बनाया और क्रांति की मसाल जलाई.

सावित्री बाई फूले का ज्योतिबा फूले के साथ
सावित्री बाई फूले का ज्योतिबा फूले के साथ

हम तो सावित्री बाई फुले की जयंती और पुण्यतिथि को असली टीचर्स डे के रूप में मनाते हैं. क्योंकि शिक्षक/शिक्षिका दिवस ऐसे ही किसी व्यक्ति की जयंती या पुण्यतिथि पर ही तो मनाना चाहिए जिसने शिक्षा के क्षेत्र में महान योगदान दिया हो. और जब आप शिक्षा के क्षेत्र में योगदान की बात करें और विशेष तौर पर महिलाओं की शिक्षा की तो आपको माता सावित्री बाई फुले के अलावा कोई नाम नज़र ही नहीं आएगा.

लेकिन जातिवादी इतिहासकारों ने ऐसी महान शिक्षिका और प्रेरणादायक व्यक्तित्व के साथ बहुत नाइंसाफी की, उनके योगदान को हमेशा नज़रअंदाज किया. हमारा देश एक ऐसे व्यक्ति के जन्मदिन पर शिक्षक दिवस मनाता है जिसपर अपने ही छात्र की थीसिस चुराकर अपने नाम से प्रकाशित करने का आरोप है. लेकिन सावित्री बाई जैसे व्यक्तित्व को छुपा पाना नामुमकिन है. आज पूरी दुनिया उन्हें सलाम कर रही है.

DPILLAR