ढ़ल गया छत्तीसगढ़ी लोकगीत का सूरज… सुरुजबाई खांडे

आज की ख़बर कला-साहित्य-सिनेमा मेरा-गांव

सुरूजबाई के आवाज में भरथरी

 

विकास विद्रोही :  छत्तीसगढी़ लोक परंपरा ने एक सूरज खो दिया. जिसने छत्तीसगढ़ी माटी की सुगंध विदेशो में भी फैलाया, साधारण सी दिखने वाली सुरूजबाई खांडे छत्तीसगढ़ी लोकगीत का ऐसा नाम है जिसे सुनकर भरथरी गीत में शामिल वाद्य यंत्र बरबस ही गुंजने लगते है मानो सुरूजबाई सामने गा रही हो.

 

भरथरी, ढोला, चंदैनी जैसे लोकगीतों की गायिका अब हमारे बीच नही रही, छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर में उन्होंने गरीबी में आखिरी सांस ली, वो अंतिम समय में भी भरथरी और पारंपरिक गीतों के लिये चिंतित थी इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि सुरूजबाई की जीवन भी भरथरी थी और मृत्यु भी लोकगीत था. लेकिन दुख है एक लोक कलाकार फिर मुफलिसी का सामना करते गुजर गया

 

मध्यप्रदेश शासन से अहिल्या देवी पुरस्कार से सम्मानित गायिका सुरुज मुफलिसी के अंधेरे में जीवन व्यतीत की. पति नि:शक्त हो गये फिर भी गायन के प्रति उनकी निष्ठा ने छत्तीसगढ़ को गौरवान्वित किया. अपनी आवाज से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध होने पर विवश कर देती परंतु वह आवाज अब हमारे यादों की कोने में ठहर गयी. वह लम्बे समय से अस्वस्थ थीं. 69 वर्ष की लम्बे जीवन में उन्होंने विलुप्त हो चुके लोकगाथा भरथरी को पुनः जीवित किया था.

 

 

 

बंगाल के जोगियों से शुरू हुआ यह लोकगीत समानता का संदेश देता “सोवियत रूस”में आयोजित “भारत महोत्सव” में सुरूजबाई खांडे ने इस विधा से विदेशी नागरिकों को भी रूबरू कराया था. उन्होंने देश का प्रतिनिधित्व कर “छत्तीसगढ़” का गौरव बढा़या. 19 से ज्यादा देशों में भरथरी और छत्तीसगढ़ी लोकगीतों को पेश कर चुकीं सुरुजबाई की माली हालत कभी ठीक नहीं रही.

क्या है भरथरी लोकगीत ?

भरथरी लोकगाथा जिसमें में दो पात्र है – भरथरी और गोपीचन्द, जिनसे ये कथा शुरु होती है. राजा भरथरी और भांजा गोपीचन्द. भरथरी की कथा बिहार, उत्तरप्रदेश और बंगाल में प्रचलित है. छत्तीसगढ़ में भरथरी की कथा कैसे आई.  इसके सम्बन्ध में विद्वानों का अलग-अलग मत है. नन्दकिशोर तिवारी जी का कहना है कि बंगाल के जोगी जब उज्जैन जाते थे. उस यात्रा के वक्त छत्तीसगढ़ में भी भरथरी की कथा प्रचलित हो गई थी. भरथरी और गोपीचन्द दोनों नाथ-पंथी थे.

नाथ-पंथी योगियों का जो सम्प्रदाय हैं, वह सम्प्रदाय नवीं दसवीं शताब्दी में आरम्भ हुआ. बंगाल बिहार और उसके आसपास योगी नाम की एक जाति रहती थी. ये लोग छुआछुत नहीं मानते थे, जात पात नहीं मानते थे. बहुत ही उन्नत मानसिकता के थे वे लोग. वे लोग नाथ पंथी योगियों जैसे थे.

नाथ पंथी योगियों का समप्रदाय नेपाल में बौद्ध और शैव साधनों के मिश्रण से हुई थी. और इसके बाद यह सम्प्रदाय पूरे हिन्दी प्रदेश में फैल गई. इस सम्प्रदाय के लोगों को पढ़े लिखे नहीं होने के कारण अशिक्षित माना जाता था. पर इनसे जो शिक्षा मिलती थी, वह बहुत से शिक्षित लोग नहीं दे पाये थे. ये लोग अपने को जोगी कहते थे. लोग उन्हें नकारते थे ये कहकर कि ये लोग शास्र विहीन हैं. ये लोग लोक-गीतों के माध्यम से लोगों का दिल जीत लेते थे.

छत्तीसगढ़ में भरथरी को योगी कहते हैं. छत्तीसगढ़ी भरथरी किसी जाति विशेष का गीत नहीं है. जो भरथरी का गीत गाते हैं वे योगी कहलाते है. गीत में भी अपने आप को वे योगी कहते हैं.

 

“सुनिले मिरगिन बात काल मिरगा ये राम मोला आये हे ओ एक जोगी ये न ओ कुदवित है ओ”

शुरु में भरथरी एक अकेला इन्सान गाया करता था वह खंजरी बजाकर गाता था. बाद में वाद्यों के साथ भरथरी का गायन होने लगा. वाद्यों में तबला, हारमोनियम, मंजीरा के साथ साथ बेंजो भी था. धीरे धीरे इसका रूप बदलता गया और भरथरी योगी गाना गाते और साथ साथ नाचते भी. ये बहुत स्वाभाविक है कि गीत के साथ नृत्य भी शामिल हो गया. न सिर्फ छत्तीसगढ़ में बल्कि पूरे हिन्दी क्षेत्र में बहुत प्रेम से गाया और सुना जाता है.

 

लोक कथा एक जगह से दूसरी जगह यात्रा करती है और जहाँ पहुँचती है वहाँ के परम्पराओं से प्रभावित होकर वहीं की बन जाती है. छत्तीसगढ़ की भरथरी में हम देखते है कि कई जगह “सतनाम” का उल्लेख है –

जैसे- ‘तैहर ले ले बेटी सतनामे ल ओ’ छत्तीसगढ़ में सतनाम पंथ प्रचलित है जिसमे सतनाम का अर्थ है नाम की महिमा. इसीलिये धीरे धीरे भरथरी में भी “सतनाम” शब्द को इस्तेमाल किया गया है

 

एसईसीएल में कार्यरत  सुरुजबाई अस्वस्थता के कारण समय से पहले रिटायर हुईं.  दो हजार रु पेंशन मिलता था फिर घर मे चार बार चोरियां हुईं जिसमें कुछ न बचा. उनके पति निःशक्त हैं. उन्होंने मुश्किलों से बेटी की शादी की. उनका बड़ा बेटा स्कूल रिक्शा चलाता है और छोटा बेटा मजदूरी करता है. उन्हें बहुत से बड़े पुरस्कार मिले पर पर्याप्त आर्थिक मदद नही मिल सकी.

छत्तीसगढ़ी लोकगीत गायिका सुरजबाई
छत्तीसगढ़ी लोकगीत गायिका सुरूजबाई

उनका जाना लोककला के आकाश में से एक नक्षत्र का अस्त हो जाना है. भरथरी का पर्याय सुरुजबाई के न होने से छत्तीसगढ़ी लोक की अपूरणीय क्षति हुई है.

आज वास्तव में प्रतीत हो रहा कि घोड़ा रोवे घोड़सार म.. हाथी रोवे हाथीसार म…सुरुजबाई अपनी विशिष्ट आवाज, पहचान और कला के साथ सदैव स्मृत रहेंगी.

 

DPILLAR