शादी के लिए क्यों जरूरी है ‘द मोस्ट हॉन्टेड मीटिंग’

Sheपोर्टर आज की ख़बर

Team dPILLAR :  दहेज बेहद घटिया समाजिक कुकृत्य है. इसका हर शोषित एक दिन शोषक के वेश में होता है. इसलिए यह वर्षों से फल- फुल रहा है. हाल ही में बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार दहेज के खिलाफ कड़े कानून लाये हैं. इस कानून को जनमानस में लोकप्रिय बनाने के लिए बिहार में मानव में श्रृंखला का आयोजन भी किया गया था.

यह कितना कारगर होगा इसकी समीक्षा तो समय के साथ होती रहेगी. फिलहाल हमारी SHEपोर्टर प्रज्ञा मिश्रा  दहेज के डील वाली उस भूतहा मिटिंग के बारे में बता रही हैं जिससे हर परिवार को दो-चार होना पड़ता है. पढ़िये…

माज के ढकोसलों के सबसे दिखावटी चोचलों में से एक है विवाह व्यवस्था. खासकर अरेंज मैरिज. जिसमें दोनों तरफ की सबसे पहली मशक्कत होती है अच्छा रिश्ता ढूंढना,और जब दोनों पार्टियों को अपनी शर्तों के अनुसार रिश्ता मिल जाता तब बात होती है दहेज की.

वैसे दहेज प्रथा बन्द हुए तो वर्षों हो गए हैं और आज दहेज का नाम सुनते ही सब ऐसा मुंह बनाते हैं मानो किसी ने कड़वी दवा की घूट दे दी हो!

लेकिन ये आज भी अरेंज मैरिज के लिए सबसे ज्यादा जरूरी डील है. बताते हैं कैसे? इसे कोई आम डील समझने की चेष्टा कतई ना करें! बल्कि इसके लिए बाकायदा एक मीटिंग बैठती है. जिसमें दोनों तरफ की पार्टी के सभी मुख्य मेंबर्स आमंत्रित होते हैं.

और फिर शुरू हो जाती है वो ‘द मोस्ट हॉन्टेड मीटिंग’. जिसमें लड़की के पिता चेहरे पर मुस्कान और मन में कुछ शिकायतें लिए बस अपना सिर ऊपर-नीचे करते रहते हैं. और लड़के वाले काजू, बादाम चरते हुए बतचौकड़ी कर अपनी मांगें रखते रहते हैं.

बात डन हो रही ही होती है कि अचानक से दीदी का देवर अपनी होने वाली भाभी को बाइक से आॉफिस छोड़ने के लिए दहेज में बाइक की मांग भी रख देता है. चलो जैसे-तैसे इकलौते देवर की बात भी अडजस्ट कर ली जाती है.

इसके पीछे लड़की वालों की सोच – “आखिर इनका लड़का सरकारी नौकर है. इतना मांग भी रहे हैं तो क्या” अब बात आती है किश्तों के बंटवारे की. अरेंज मैरिज में चढ़ावा (दहेज का दूसरा नाम ) इसकी किश्तों के नाम भी कई टाइप के रखें गए हैं. जैसे बरिछा में गाड़ी, तिलक में पांच लाख कैश, गोदभराई में फलाना, धान भराई मे ढ़िमकाना, मिठाई, खटाई, पिटाई, और न जाने क्या-क्या? जिसमें नहाने के साबुन से लेकर घर का राशन तक एसी, फ्रिज समेत सब कुछ देना अनिवार्य होता है. शायद कमोड देना वर्जित है वरना वो भी लिस्ट में होता.

कुल मिलाकर इन चोंचलों के साथ डील यानी शादी तय हो जाती है. और इन सब के बाद भी दिखावे की प्रक्रिया खत्म नहीं होती, बल्कि पूरे शहर में न्यौता भेज स्टेज पर सजा कर हर उस किश्त की नुमाइश होती है जो डील के अनुसार एक-दूसरे को दी जानी है.

मजे कि बात ये कि हमारा सो कॉल्ड समाज इनफैक्ट हमारे ही रिलेटिव इन सब को दहेज का नाम नहीं बल्कि इसे लड़की के पिता की जिम्मेदारी और लड़के के पिता का हक कहते हैं. और इस ही तरह बढ़ावा देते हैं कि उन्होंने अपनी बेटी की शादी में इतना किया आप कम कैसे कर सकते हैं. (खैर जो भी हो बदलाव सिर्फ ऊपरी तौर पर है असल में हम वहीं है… दिखावटी)

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