फणीश्वरनाथ रेणु : परंपरा को सहेजनेवाला, बचानेवाला और तोड़नेवाला कथाकार

कला-साहित्य-सिनेमा खिड़की के पार

Team dPILLAR:  आजाद भारत के गांव, खेत, खलिहान और किसान को साहित्य में पिरोने वाले कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु का आज जन्मदिन है. साहित्य बिरादरी के लोग कहते हैं कि रेणु नहीं होते तो हो सकता है कि हिन्दी साहित्य आंचलिक काहनियों का मोहताज रह जाता. केवल साहित्यकार नहीं, बल्कि रेणु एक तेज तर्रार स्वतंत्रता सेनानी भी थे. नेपाल को जनतंत्र बनाने वाले आंदोलन के नायक थे फणीश्वरनाथ रेणु.
नेपाल में पले बढ़े रेणु वैसे तो बिहार के पुर्णिया जिले से थे, मगर इनकी परवरिश अररिया और फारबिसगंज के सीमावर्ती इलाकों में अधिक हुई थी. सो इसका रंग भी उनके लेखन में दिखता है.

www.dpillar.com  अमर कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु के जन्मदिन पर पेश करता है ये आलेख, जिसे लिखा है अपनी “खिड़की के पार” से “निराला” ने.

फिल्म तीसरी कसम का एक सीन


बड़ी तकरार हुई थी तब. रेणु की कहानी ‘मारे गये गुलफाम उर्फ तीसरी कसम’ पर. शैलेंद्र ‘तीसरी कसम’ फिल्म बना रहे थे. कथानक का आखिरी स्वरूप तय हो रहा था. राजकपूर चाहते थे कि अंत में नायक-नायिका मिल जाये. खूबसूरत प्रेम कहानी का ट्रैजिक समापन न हो. दूसरी ओर रेणु जिद पर अड़ गये कि उन्होंने नायक-नायिका को अलग किया है तो फिल्म में भी ऐसा ही होगा. क्योंकि यही दारूण पक्ष इस कहानी में सबसे अहम है.

कहा तो यहां तक जाता है कि रेणु ने तब यह शर्त भी रख दी कि यदि कहानी के इस पक्ष से छेड़छाड़ हुई तो दूसरी कहानी की तलाश कर लें आपलोग! शैलेंद्र और राजकपूर को रेणु की शर्त माननी पड़ी. यह कहने-कहानेवाली है. यह बात सच हो न हो लेकिन हिंदी के अप्रतीम रचनाकार मानेजानेवाले फणीश्वरनाथ रेणु पूरी जिंदगी को अपनी शर्तों पर ही जीते रहे और धारा के विरूद्ध चलकर स्थापित और जड़ परंपराओं को बदलते रहे. यह स्थापित सच है.

जैसा कि वरिष्ठ आलोचक रविभूषण कहते हैं-‘‘ रेणु ने हिंदी साहित्य जगत की स्थापित विधा को अपनी शैली से तोड़ डाला था. यह कोई कम चुनौती भरा काम नहीं था.‘मैला आंचल’ के माध्यम से रेणु ने वैसा ही किया था.’’ यह सच भी है. ‘मैला आंचल’  के पहले हिंदी कथा-कहानी-उपन्यास जगत में बोलियों का, आंचलिकता का, देशज शैली का इस तरह बेधड़क इस्तेमाल करने का साहस शायद ही कोई साहित्यकार जुटा पा रहा था. तब हिंदी साहित्य के दिग्गजों को हिंदी के मेनस्ट्रीम में लोक बोलियों व लोकशैली के सीधे प्रयोग से एक अलगाव-दुराव का भाव भी था.

लेकिन रेणु ने मैला आंचल लिखते हुए उन सारी परंपराओं को दरकिनार किया और बाद के दिनों से लेकर अब तक रेणु के दिखाये मार्ग पर ही हिंदी साहित्य का एक बड़ा लेखक वर्ग चल रहा है. बांग्ला के जानेमाने कवि विश्वजीत सेन कहते हैं- रेणु को मैं अप्रतीम रचनाकार नहीं मानता. लेकिन यह जरूर कहता हूं कि स्थानीयता, आंचलिकता को मुख्यधारा में स्थापित करने और व्यक्तिनायक की परंपरा को तोड़ समूह, क्षेत्र, परिवेश, अंचल को नायक बनाने का साहस उन्होंने किया. जो किसी ने नहीं किया था.

‘मैला आंचल’ की बजाय उनकी दूसरी रचनाओं पर भी गौर करें तो चाहे वह रेणु की कहानियां हों, परति-परिकथा जैसी उत्कृष्ट रचना हो या पत्रकारिता के मानवीय पक्षों को समेटता हुआ अमर रिपोर्ताज ‘ऋणजल-धनजल’ हो. सबमें नयापन है, एक नयी शैली है.

यह तो रेणु के कृतित्व की दुनिया हुई. व्यक्तिगत जीवन में भी रेणु ऐसे ही प्रयोग करते रहें. परंपराओं को बचाये-बनाये रखने की जितनी बेचैनी लिये रहते थे, उतनी ही कसमसाहट परंपराओं को तोड़ने की भी रहती थी. रेणु के रचनासंसार और व्यक्तित्व पर नये सिरे से काम कर रहे अनंत कहते हैं कि जब रेणु के गांव में होली होती थी तो पहले उनके दरवाजे पर होली गायन होता. और वहां से उठने के बाद रेणु समूह को लिये बगल के मुस्लिम गांव में चले जाते.  वहां से मुस्लिम जमात को होली के टोली में शामिल कर फिर गांव भ्रमण करते.

फणीश्वरनाथ रेणु/ तस्वीर- गुगल

अनंत कहते हैं- “रेणु का मानना था कि सांप्रदायिकता को मात देने का फ्रंट राजनीति नहीं हो सकती, इसके लिए सामाजिक फ्रंट पर मोरचा खोलना होगा. ऐसा वह हमेशा करते रहे. अपने घर में जब उनके बड़े बेटे पद्मपराग राय की बिटिया हुई तो रेणु की इच्छा के मुताबिक एक का नाम शबाना और दूसरे का नाम जरीना रखा गया. अनंत कहते हैं, ‘‘ रेणु इसलिए और साहित्यकारों से अलग खड़े नजर आते हैं, क्योंकि वह सिर्फ लेखन भर कर परिवर्तन की आस नहीं करते थे, बल्कि खुद एक लड़ाके की तरह जीवन भर लगे रहे.’’ चाहे वह नेपाल क्रांति की बात हो, जब वह पिता और भाई की मृत्यु के शोक से उबरे भी नहीं थे कि कोईराला बंधुओं के बुलावे पर नेपाल पहुंच गये.

रेणु एक ही समय में एक साथ बंदूक और कलम से क्रांति करते रहे. चाहे आजादी की लड़ाई में पुर्णिया के इलाके में वेष बदलकर कोसी के अंचल में लोगों को प्रेरित करने का काम हो. बकौल अनंत,  “रेणु 14 साल की उम्र में पहली बार गिरफ्तार हुए और उसके बाद कई-कई बार उनकी पिटाई-धराई होती रही. उन्हें पकड़ने में अंगरेजों के छक्के छुट गये थे, क्योंकि वह औरत का वेष बनाकर भी इलाके में बैलगाड़ी से यात्रा करते रहते थे. जब पुलिसवाले पूछते तो कहा जाता कि घुंघटे में बहुरिया बैठी हुई है. जब रेणु को एक दफा पकड़ने की बारी आयी तो पुलिस को उनके गांव औराहीं हिंगना को चारो ओर से घेरना पड़ा और जब रेणु पकड़ में आ गये तो उनके लंबे बालों को पकड़कर, पटक-पटक कर उनकी बेरहम पिटाई भी हुई.

हंसमुख रेणु / तस्वीर- गुगल

रेणु रूप बदलने का काम निजी जीवन में करते थे, असर लेखन में भी साफ दिखता है. घोर विषाद, परम दुख, अपार संकट की घड़ी का वर्णन करते हैं रेणु तो रोंगटे खड़े होते हैं, आंखों से आंसू भी निकलते हैं. लेकिन उसी दुख में तुरंत सुख का क्षण तलाशते हैं- जैसे कि कोसी के प्रलय में तबाह होती जिंदगी और तबाह होती जिंदगियों द्वारा मृदंगिया नाच करवाना.

लेखन और विचारों से नयी क्रांति का सूत्रपात करने की कोशिश करनेवाले रेणु ने वैचारिक राजनीति की बजाय एक बार चुनावी राजनीति की राह भी पकड़ी. लेकिन निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव हार गये. अपने जीवन में खुद को प्रेमी भी अव्वल किस्म का साबित किया. जब लतिका नामक नर्स ने पीएमसीएच में उनकी खूब सेवा की, वे चंगे हुए तो उन्होंने लतिका के सामने शादी का प्रस्ताव रखा. अनंत के अनुसार, लतिका पारंपरिक कारणों से इंकार कर गयीं. तब रेणु ने लतिका को अपने हाथ पर गोदना से लिखे गये अंगरेजी के तीन अक्षर दिखाया- एफएनएम. लिखवाने का आशय तो था फणीश्वरनाथ मंडल. लेकिन रेणु ने लतिका को समझाया कि उनका नाम है फणीश्वरनाथ मुखर्जी. और फिर समझाया कि वह बंगाली ब्राह्मण हैं. प्रेम को पाने के लिए बच्चों-सा झूठ बोलने का साहस भी कोई रेणु- सा अल्हड़ ही कर सकता था.

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