पुस्तक समीक्षा “साथ असाथ” : यादों की बारात जैसी हैं अंचित की कविताएं

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Team dPILLAR : तब महेन्द्रू घाट सीमेंट का गोदाम नहीं था, तब गंगा सीमेंट का खेत नहीं थी. और तब महेन्द्रू घाट पर दो पेड़ों के बीच एक ख्वाब पाला जा सकता था. एक इंसान को कितने पेड़ चाहिए. ये हिसाब नहीं लगाने की जरूरत, ना बारिशों में कीचड़ से बचने की जरूरत. एक झोपड़ी थी वहां, जिसकी एक दीवार से लगा मैं घंटों बैठा रहता. साथ पहली मोहब्बत होती.

ऊपर की लाइनें साल 2005 के महेन्द्रू घाट (पटना) को खयाल में रखकर लिखी गई हैं. पहली बार पढ़ कर लगेगा जैसा किसी का संस्मरण पढ़ रहे हों. यकीन नहीं तो एक बार फिर से पढ़ के देखिए.

अंचित की नई किताब "साथ असाथ"
अंचित की नई किताब “साथ असाथ”

दरअसल आज से 13 साल पहले के पटना को खयाल में रखकर लिखी ये लाइनें एक कविता का हिस्सा है. जिसे लिखा है पटना के युवा कवि अंचित ने. अपनी कविताओं के नए संकलन साथ-असाथ में. इस नई कविता संकलन को छपे अभी हफ्ते भर भी नहीं हुआ है, मगर सोशल मीडिया से लेकर स्थानीय साहित्य बिरादरी में अंचित के कविताओं की चर्चा हो रही है.

अंचित की ये दूसरी किताब है. Kindle पर ऑफ नोट्स नाम से कविताओं का एक संकलन इसके पहले छप चुका है. इस बार किताब असल में कागज के किताब के रूप में पाठकों के हाथ में है, इसीलिए पाठकों की प्रतिक्रियाएं भी मिलने लगी हैं.

“हिंदी साहित्य, कविता के भविष्य को लेकर यदि आप किसी भी वजह से सशंकित हैं तो आपके पास थोड़ा निश्चिंत होने का एक मौका है. साथ-असाथ महज एक काव्य संग्रह नहीं है, बल्कि आपकी तमाम संवेदनाओं को झकझोरते हुए यह हिंदी साहित्य, कविता के सुरक्षित, सुनहरे भविष्य के लिए निश्चिंत होने की वजह भी बनता दिखता है – प्रभात रंजन, साहित्यकार

अंचित ने अपनी कविताओं का ये संकलन बहन अमोघा को समर्पित किया है. बकौल अंचित, “किताब का बड़ा हिस्सा कैंसर अस्पताल में लिखा गया है, जहां मैं अपनी बहन की देखभाल करता था. कई कविताएं अवसाद में लिखी गई हैं. कुछ तो तब लिखी गईं है जब इंसान चेतन होते हुए भी शुन्य काल में पहुंच जाता है. ये कविताएं तब के कवि की चेतनता हैं. कह सकते हैं”.

किताब के बारे में वरिष्ठ साहित्यकार अरुण कमल लिखते हैं,

“अंचित की ये कविताएं बिलकुल नयी, अप्रत्याशित कविताएँ हैं, शायद भावी शताब्दी की कविताएं. ऐसी कविताएँ हिंदी में आज से पहले लिखी नहीं गयीं. यहाँ सब कुछ मिल कर एक हो जाता है और कुछ भी बहिष्कृत नहीं, जैसे कि यह अनुभूतियों का ब्रह्मांडीकरण हो. ये कविताएँ हमारे सोचने विचारने के सारे ढर्रों को तोड़ती हुईं, सारे कपड़े उतारती अपनी आदिम निष्कलुषता में रात के अँधेरे में हमें पुकारती है.”

आज के दौर में जब युवा साहित्यकारों को प्रकाशक ढूंढने के लिए जमीन-आसमान एक करना पड़ा रहा है, अंचित के ही एक साथी बाल मुकुन्द ने प्रकाशक की भूमिका निभाई है. बाल मुकुन्द कहते हैं,

“साथ-असाथ को लेकर हमने जितने ख्वाब बुने थे, तेजी से साकार हुए हैं. कायदे से किताब बाज़ार में अब पहुंची है. किन्तु लोगों ने जिस उत्सुकता से इसे पढ़ने में रुचि दिखाई है, हमारा काम थोड़ा कठिन हो गया है. किताब पढ़ने के बाद सोशल मीडिया और साहित्य जगत से प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो गई हैं. इससे हमें संबल मिला है. प्रकाशन में सुधार के लिए ये प्रतिक्रियाएं हमारे लिए रास्ता दिखाती हैंयुवा कवि अंचित की कविताएं इसलिए खास बन जाती हैं क्योंकि ये कविता की शैली में नहीं लिखी गई हैं. इन्हें गद्द का भी पूर्ण रूप नहीं दिया गया है. शायद इसीलिए भी ये भविष्य की कविताएं कही जा सकती हैं.

अंचित ने नेरुदा को खूब पढ़ा है. उनके पसंदीदा लेखकों में नेरुदा का नाम सबसे ऊपर आता है. साथ-असाथ में छपी कई कविताओं में भी इसकी झलक देखने को मिल जाती है. कविताएं स्मृत्तियों की पुनरावृति कराती हैं. पढ़ने के बाद आपको भी लगने लगेगा कि अपनी स्मृत्तियों को संजोने के लिए एक कविता लिख लें.

कविताएं कैसे लिखें, ये जानने के लिए भी पढ़िए अंचित की कविताएं. ऐसा इसलिए क्योंकि इस तरह लिखी कविताएं एकदम वैसे ही सहज लगती हैं, जैसे यादों की बारात गुजर रही हो.

DPILLAR