हमारी “रौशनी” : बोल की लब आजाद हैं तेरे, बोल की ज़बां अब तक तेरी है

Sheपोर्टर आज की ख़बर

Team dPILLAR: विस्तृत नभ का कोई कोना/ मेरा न कभी अपना होना/ परिचय इतना, इतिहास यही/ उमड़ी कल थी, मिट आज चली! आज से कोई सत्तर-अस्सी साल पहले महादेवी वर्मा ने स्त्री के लिए ये लाइनें लिखी होंगी. कहते हैं कि भारत गुलाम इसीलिए भी था, क्योंकि उसने स्त्री को गुलाम बनाकर रखा. 

अब भारत आजाद है. ऐसा इतिहास में लिखा गया है. हम पढ़ते भी हैं. मगर हम ये नहीं कह सकते कि आजाद भारत की स्त्री भी आजाद है. और जब-जब स्त्री ने खुद से लिखना चाहा कि उसके लब आजाद हैं, हमने हर बार उसके लिखे को मिटा दिया. क्योंकि हम इतिहास से चलते हैं. उसी को पढ़ते हैं. उसी को मानते हैं. और हमारे इतिहास ने ही हमें कह दिया है कि हम पितृसतात्मक समाज वाले लोग हैं.

पोक्सो के तहत दर्ज मामले
पोक्सो के तहत दर्ज मामले

“रौशनी”. खुद से अपना नाम रखा है हमारी Sheपोर्टर ने. उम्र करीब 14 साल है. एकदम आपके बेटी जैसी. इसके भी कुछ ख्वाब हैं. हर लड़की की तरह. समाज और पुलिस को जितना आपने नहीं समझा होगा, उससे ज्यादा जानती है और समझती है. क्योंकि महज 14 की उम्र में ही इसने ऐसी लड़ाई जीती है, जिसकी चक्रव्यूह में देश की हजारों “रौशनियां” कैद हैं. कहती है कि पढ़ने के सिवा और कुछ करती ही नहीं हूं. पर अब लिखेगी. ऐसा वादा किया है. अपने लिए लिखेगी.

www.dpillar.com पर आगे पढ़िए हमारी Sheपोर्टर “रौशनी” की ये स्पेशल स्टोरी- 

रौशनी ने अपनी बात स्वयं रिपोर्टर नीरज प्रियदर्शी को लिख के दिया है.
रौशनी की हैंडरायटिंग वाला नोट जिसे उसने dpillar.com के लिए लिखा है.

मैं चाहती हूं कि जिंदगी हर कोई अपने हिसाब से जिए. मैंने अपनी जिंदगी में बहुत कुछ सहा है. मगर अब और नहीं सह सकती. मैं खुद के लिए बहुत कुछ करना चाहती हूं. मैं चाहती हूं कि हर इन्सान जिसके साथ गलत हो रहा है. वह अपने लिए अवाज उठाए. सिर्फ खुद के लिए.

ये मत देखें कि परिवार क्या बोलेगा. समाज किस नजर से हमें देखेगा, दुनिया क्या कहेगी. हर किसी को एक ही बार जिंदगी मिलती है. ये जिंदगी मेरी है. ये शरीर मेरा है. सिर्फ और सिर्फ मेरा. इस चीज पर किसी और का हक नहीं है. मेरी जिंदगी मुझे पता होनी चाहिए कि मुझे कैसे जीना है. किसी की मजबूरी के लिए हम अपने आप को कुर्बान नहीं कर सकते.

मेरे भी कुछ सपने हैं. इच्छाएं हैं. जिन्हें पूरा करना है. लेकिन किसी के मनोरंजन के लिए हम इन चीजों को कुर्बान नहीं कर सकते. जिंदगी मेरी है इसीलिए इस पर मेरा अधिकार है, किसी और का नहीं. किसी के मनोरंजन, इच्छा के लिए हमें अपनी जिंदगी का बलिदान नहीं देना चाहिए. अगर कोई गलत है तो उसे सजा मिलनी चाहिए. जब मैं अपने पैरों पर खड़ी हो जाउंगी, उस दिन मैं ऐसे दरिंदों को सजा जरूर दिलवाउंगी और कोशिश करुंगी कि किसी भी लड़की के साथ ऐसा न हो.

बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से शुरु करते हैं. वो इसलिए, क्योंकि दो दिन पहले जब पीएम देश भर के बच्चों को परीक्षाओं से निपटने का पाठ पढ़ा रहे थे, उसी दिन रौशनी के सब्र का बांध भी टूटा था. उधर हमारे और आपके बच्चे पीएम का वीडियो कॉन्फेरेंसिंग वाला क्लास ले रहे थे, इधर रौशनी एक फैसला ले रही थी. जीवन का फैसला.

नोटबंदी की तरह अचानक वाला फैसला नहीं था वो, क्योंकि रौशनी कहती है 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अच्छे हैं. मगर थोड़े बुरे भी हैं.

अच्छे हैं क्योंकि उन्होंने जीएसटी को लागू करवाया. गरीब महिलाओं को फ्री में गैस बांटने का काम किया है. क्लीन इंडिया (भारत स्वच्छता मिशन) के लिए भी काम हो रहा है.

लेकिन, वो बुरे भी है. हमारे किसानों की इतनी दिक्कते हैं और वो उनके लिए कुछ नहीं कर रहे हैं. वो कितना मेहनत करते हैं. पर उन्हें उनकी मेहनत का फल नहीं मिलता.

उन्होंने अचानक से Demonetization (नोटबंदी) कर दिया. अचनाक से नोट बदल जाने से गरीब लोगों को कितनी दिक्कत हुई. उनके पास कम पैसा था, इसीलिए बदलवा भी नहीं पा रहे थे.

नरेंद्र मोदी ने एक काम बहुत गलत किया है. उन्होंने वैकेंसी नहीं निकाली. नौकरी नहीं मिल रही है किसी को. न्यूज पेपर्स पढ़ती हूं. सब जानती हूं.

मेरी प्रिंसिपल परफेक्ट हैं. एकदम परफेक्ट.”

बात जब देश की आती है तो रौशनी का मन इस देश पर कुर्बान हो जाने का करता है. जी हम उसी देश की बात कर रहे हैं जिस देश में दुनिया भर के वो 19 फीसदी बच्चे भी रहते हैं जो बाल उम्र में ही यौन हिंसा के शिकार हो गए हैं.  आपको फिर से बता दें कि रौशनी के दादा रिटायर्ड फौजी हैं. वही दादा जिनको रौशनी ने एक्सपोज कर दिया है. जो अब अपनी ही नातिन के साथ दुष्कर्म करने के आरोप में जेल में बंद हैं.

और फिर भी रौशनी का मन करता है कि सोल्जर (सैनिक) बनकर देश के लिए मिट जाएं.     

पहले मैंने सोचा कि सोल्जर बन जाऊं. देश के लिए कुर्बान हो जाऊं. सोल्जर नहीं होगा तो देश की रक्षा कौन करेगा. हमलोग खुशी से रहते हैं कि क्योंकि सोल्जर बोर्डर पर खड़े रहते हैं.

अगर सोल्जर ना रहे तो मैं खुश नहीं रह पाउंगी.

अब मुझे आइपीएस बनना है. पुलिस अच्छा काम करती है. समाज के गलत लोगों को पकड़ती है. उन्हें सजा दिलाती है. जो गलत करेंगे उन्हें सजा दिलवाउंगी.

विशाल सर (सिटी एसपी, पटना इस्ट) अच्छे हैं. उनसे बहुत कम देर के लिए मिल पाई थी. और मिलना चाहती हूं उनसे. उनसे बात करनी है. बहुत कुछ बताना है. वो कैसे काम करते हैं, उनसे सीखना है.

मैंने बहुत कुछ झेला हैं अपनी लाइफ में. किसी और के साथ भी ऐसा होता होगा. सबको बताना पड़ेगा. किसी को इस तरह नहीं झेलने दूंगी.

समाज की बात आते ही रौशनी का चेहरा नरम पड़ने लगता हैं. पर झट से खुद को संभालती हुई इस जिरह में पड़ जाती है कि हमारी सोसाइटी के लोगों के पास सेंस नाम की कोई चीज नहीं रह गई है. बातचीत के दौरान रौशनी ने समाज का जो नजरिया समने रखा, यकीन मानिए! वो हमारे और आपके लिए शर्म करने की बात है. रौशनी ने अपनी लड़ाई के उन तीन अहम किरदारों के बारे में भी बताया जिनसे लड़ते हुए वो आखिरी फैसले तक पहुंची. पुलिस की तफ्तीश में तीन नए नाम दर्ज किए जाएंगे, जिनमें उसी की मोहल्ले के दो बुजुर्ग हैं और एक टीचर हैं.

रौशनी ने दोस्त नहीं बनाए हैं और उसे बनाना भी नहीं है. शायद उसका भरोसा उठ गया है हमसे भी, आपसे भी.

अब कोई दोस्त नहीं है. बनाने का मन भी नहीं करता. कोई मुझे समझे तब तो.

पड़ोस का एक लड़का था. सर बोलती थी. फ्रेंड टाइप से थे. पढ़ाते भी थे मुझे. मैंने उनसे जब अपनी बात बताई तो उन्होंने बोला कि तुम भी इन्ज्वाय करती होगी! और तभी मुझे समझ में आ गया. नाम नहीं बताउंगी उनका. उन्होंने गलत नहीं किया है मेरे साथ.

दो और लोग हैं. वो तो बुढउ लोग हैं. उनका नाम….. (चुप हो जाती है) .अब लगता है कि आखिर वो लोग मेरे साथ जबरदस्ती क्यों करते थे!

जहां (जगनपुरा, पटना) रहती हूं, वो घटिया मोहल्ला है. वहां के लोगों के पास सेंस ही नहीं है.

बिहार में पोक्सो के तहत 2016 में 233 मामले दर्ज हुए
बिहार में पोक्सो के तहत 2016 में 233 मामले दर्ज हुए

परिवार पर आते-आते रौशनी मद्धिम पड़ जाती है. सात साल पहले पिता का साया छिन गया. कहां हैं, किसी को नहीं मालूम. पुलिस को भी नहीं. घर वाले ये मान चुके हैं कि पिता ने सुसाइड कर लिया है. पुलिस भी यही मानकर चल रही है. रौशनी अपनी आपबीती मां को बता चुकी थी. दोस्त से भी बता चुकी थी. जब छोटे भाई से शेयर किया तो उसने परिवार को बचाने की बात कर दी.

शायद इसीलिए कॉलर टाइट करके रौशनी कहती है- “ ये जीवन मेरा अपना है”

मुझे समझ में नहीं आता कि पापा ने सुसाइड क्यों किया? मैंने उनको देखा है. उनसे बात की है. मुझे इतना पता था कि पापा थोड़े मेंटली बीमार हैं. कोई अपने बेटे को कैसे मार सकता है. मेरे घर वाले पहेली की तरह हैं.

छोटे भाई से मेरी पटती है. फिफ्थ में पढ़ता है.मैंने उससे सबकुछ शेयर किया था. उसने बोला कि कुछ भी करो बस मां और दादा को कुछ नहीं होना चाहिए. दादा उसे बहुत मानते हैं.

मुझे किसी भी एक्स्ट्रा को-करिकुलर एक्टिवीटी में पार्टिसिपेट नहीं करने दिया जाता था. हाल ही में तो लैपटाप मिला है. मेरे सब दोस्तों के पास फोन था. पर मेरे घर से अलाउ नहीं था.

सुसाइड करने जा रही थी. मरने के बहुत सारे तरीके हैं. सोचा फांसी लगा कर मर जाती हूं. फिर लगा कि नहीं जीवन मिला है तो जीना पड़ेगा. मेरे बहुत सारे ख्वाब हैं.

फिर सोचा कि भाग जाती हूं. कहीं भी जाती. मगर जाती. अपने ख्वाबों को पूरा करके रहूंगी.

संस्कृत पढ़ने का मन करता है. बहुत अच्छा लगता है. मार्क्स भी बहुत मिलता है. मगर दादा कहते हैं कि संस्कृत पढ़ने की भाषा नहीं रह गई है.

पोक्सो के तहत भारत के विभिन्न राज्यों में दर्ज केस
Design/dpillar

डिजिटल इंडिया के सपने तले ही सही. होने को तो ये भी हो सकता था रौशनी अपना एक ट्वीटर या फिर फेसबुक अकाउंट बनाकर सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या फिर मेनका गांधी को ट्वीट करती, उन्हें टैग करती. मगर घरवालों ने इतना भी तो एक्सेस नहीं दिया था. अब तक तो आपको पता चल ही गया होगा कि उसको फेसबुक, व्हाट्एप्प और ट्वीटर की ठीक-ठाक समझ होगी.

दरअसल, रौशनी को सोशल होने ही नहीं दिया गया. वो जिन्हें हम और आप अपने कहते हैं, उन सभी से रौशनी ने अपनी बात बताई थी. पर किसी ने नहीं सुनी. भाई से भी सबकुछ शेयर किया, पर उसके लिए परिवार अहम था.

प्रधानमंत्री के मन की बात बच्चों पर कितना फर्क डालेगी, इस पर बहसें होती रहेंगी. मसला ये कि हमने “रौशनी” जैसी और कितनी बच्चियों को बंद कमरे में समेट कर रख दिया है. दीवारें बोलती तो हैं नहीं, इसीलिए आप और हम अपने बच्चों के साथ क्या-क्या करते हैं, कौन देखने जाएगा.

“हमारे लिए रौशनी एक इक्जांपल है. पोक्सो(बाल यौन उत्पीड़न एवं सुरक्षा अधिनियम, 2012) मामलों को निपटाने के संदर्भ में पुलिस के लिए एक केस स्ट्डी भी है. अनुसंधान भी इसी तर्ज पर हो रहा है. मेरे क्षेत्राधिकार में जितने भी थाने आते हैं, सभी में आपको बाल-सखा के पोस्टर्स और पैंपलेट्स भी मिलेंगे, जिनमें पोक्सो कानून के बारे समझाया गया है. उन थानों में हमने चाइल्ड लाइन के साथ मिलकर वर्कशॉप भी कराया है. इसी तरह दूसरे अन्य थानों में किया जाना चाहिए. पुलिस को भी पोक्सो को लेकर जागरूक करने की उतनी ही जरूरत है. रौशनी के जीवन में हर रंग हों, इसको सुनिश्चित किया जाएगा. हमारी कोशिश होगी कि वो जल्दी ही फिर से अपने स्कूल जाने लगे.” – विशाल शर्मा, सिटी एसपी, पटना ईस्ट

नोट- बिहार की राजधानी पटना के रामकृष्ण नगर थाने में दिनांक 12–02-18 को दर्ज कांड संख्या 44/18 के मुताबिक रौशनी के दादा ने सात सालों तक उसका यौन शोषण किया. रौशनी ने एक साल पहले जब दादा के कुकृत्य को अपनी मां से बताया तो उन्होंने ये कह दिया कि “दादा ही तो हैं. उन्हीं से तो घर का खर्च भी चलता है.” फिर स्कूल में प्रिंसिपल को सारी बात बताई. स्कूल प्रबंधन ने पुलिस को सूचना दी. और मौके पर पहुंच कर पुलिस ने तुरंत ही रौशनी को अपनी कस्टडी में ले लिया. दादा और मां दोनो फिलहाल जेल में हैं. रौशनी गाय घाट स्थित बाल सुधार गृह में है. वहीं रौशनी से हुई बातचीत के आधार पर ये रिपोर्ट तैयार की गई है. रौशनी के शब्दों को हूबहू रखने की कोशिश की गई है. पत्रकारिय मानकों को ध्यान में रखते हुए पीड़िता की असली पहचान  यहां नहीं लिखी गई है. पीड़िता ने खुद से अपना नाम रौशनी रखा है.

DPILLAR