आपकी बहन किस कंपनी का पैड इस्तेमाल करती हैं? जवाब है आपके पास !

Sheपोर्टर आज की ख़बर

Team dPILLAR: अक्षय कुमार की नई फिल्म “पैडमैन” का इससे बेहतर प्रोमोशन नहीं हो सकता था. सुबह-सुबह जैसे ही फेसबुक टाइमलाइन पर नजर जाती, हर तीसरे-चौथे पोस्ट में सैनिट्री पैड लिए लड़कियां सेल्फी पोस्ट कर रही हैं.

वह सैनिट्री पैड जो कल तक घरों में तह के नीचे तह लगाकर छुपाया जाता था, आज सोशल मीडिया पर छा गया है. तो क्या ऐसे में हम मान लें कि अक्षय कुमार और उनकी आने वाली फिल्म पैडमैन वाकई में सैनिट्री पैड और माहवारी को लेकर हमारे समाज में दीमक की तरह जो सोच घर कर गई है, उसे दूर कर पाएगी?

उसके पहले कि आप भी सोशल मीडिया पर जाकर सैनिट्री पैड के साथ एक सेल्फी पोस्ट करें, एक बार पढ़ लीजिए हमारी  Sheपोर्टर प्रज्ञा मिश्रा को, जिनके कुछ सवाल  बैहद मौजूं  हैं – :

लगता है कि हाथों में एक पैड लेकर उसके साथ सेल्फी खींचकर सोशल मीडिया पर पोस्ट कर देने से सबकी सोच बदल जायेगी? नहीं. क्योंकि आपकी एक तस्वीर से उन सो कॉल्ड ‘सज्जनों’ की आँखों पर से पर्दा नहीं हटने वाला!

वो लोग तो आपकी इस महानता पर अपना मुंह तक नहीं खोलेंगे. वो जिसके भी पोस्ट में पैड वाली सेल्फी देखेंगे बस खीझ कर इग्नोर कर देंगे. वो जानते है अगर यहाँ बोले तो सरेआम ट्रोल कर दिए जाएंगे. और कुछ तो भभकी- भभकी में ही खुद एक पैड पकड़कर फोटू तक चेंप दिए होंगे! और शायद कुछ मुझे पढ़ भी रहे होंगे! वो औरतों के बारे में अपनी ‘मुर्दा सोच’ को जिसका आज के वास्तविक जीवन से कोई वास्ता नहीं है उसे अपने दिल ओ दिमाग की जड़ो में इस कदर जमा चुके है कि जब भी औरत और मर्द के बीच पारदर्शिता की बात होती है तो उन्हें सबसे ज्यादा मिर्ची लगती है.

पता है क्यों? क्योंकि उन्हें अपने  ‘पुरुषवादी’ वजूद को खोने का डर सताने लगता है.  हाँ,  हर कोई एक सोच का नहीं हो सकता लेकिन ज़्यादातर लोग ऐसे ही सोच से ग्रसित हैं. जिनके हिसाब से एक औरत का पूरा जीवन सिर्फ संघर्ष में बिताने के लिए होता है.

बचपन में भाई के साथ छोटी-छोटी बातों पर संघर्ष! थोड़ी बड़ी होने पर अपने मन की बात तक न कह पाने का संघर्ष! जब महीना हो तो पूरे परिवार से कटे-कटे रहने का संघर्ष! घर के काम के साथ पढाई का संघर्ष! बेमन शादी का संघर्ष! फिर पीरियड्स के बेइंतेहा दर्द में दिन भर काम का संघर्ष और रात में उस दर्द में भी मुस्कुरा कर पति को सुख देने का संघर्ष!

हाय रे संघर्ष! अरे नहीं! मैं आपकी बात नहीं कर रही. आप तो पहले से महिलाओं की बराबरी के मुद्दे पर बोलते आए हैं! है ना?

फोटो- गूगल
फोटो- गूगल

आप तो हर महीने अपनी बहन का उदास चेहरा देखकर उससे पूछते हैं- ‘कि क्या हुआ are you on periods? ऐसा करो जाओ आराम करो’. है ना?  आप तो हर महीने अपनी बीवी से पूछते होंगे कि ‘लौटते वक्त मैं पैड लेता आऊं?’ और जब आपकी दोस्त क्लास में ये कहती होगी ‘कि कुछ नहीं यार पेट में दर्द है’  तब तो पक्का आप ही होते होंगे जो उस वक्त उसकी तरफ प्यार से कुर्सी खिसकाते होंगे!

और हां आप जब भी किसी लड़की के कपड़ों पर खून के धब्बे देखते होंगे, तब उस दाग को घूर घूर कर और गाढ़ा करने के बजाय आप ही जाकर उस महिला की मदद करते होंगे; है ना सच!

अगर ऐसा है तो बहुत अफ़सोस है कि आपके इतना सब करने के बाद भी समाज में खुलापन क्यों नही हैं? क्योंकि हम अभी भी खुद की सोच को पंख नहीं दे पाए हैं. अगर वाकई सोच बदलनी है तो सोच को पकड़िये और उसे वहीँ खत्म कर दीजिये! पहले खुद से शुरू कीजिये.

जाइये पूछिये अपनी बेटी, अपनी माँ, अपनी बहन या अपनी बीवी से की पीरियड्स के वक्त उन्हें क्या-क्या परेशानियां होती है! यकीन मानिए जिस वक्त आप अपनी बेटी से पीरियड्स के बारे में खुल कर बात कर रहे होंगे न तब आप भी खुद में एक अंतर पाएंगे और वो अंतर सच में आपको ‘रियल मैन’ वाली फीलिंग देगा.

DPILLAR