Film Review : पद्मावत की हर तीसरी लाइन में “राजपूत” इरिटेट करता है !

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अंचित : पद्मावती. माफ करिएगा अब पद्मावत. देखने के पीछे बस एक कारण था. जिस कारण से हर शुक्रवार मन बेचैन हो उठता है. सिनेमा. और उस से प्रेम. दूसरा कारण, मनाही. चार राज्यों में कमेटियाँ बन गयीं और अपने यहाँ मौन धारण कर लिया गया. बाइक- सवार छोरे हथियार लहराते पटना की सड़कों पर चक्कर काटने लगे. दुनिया के सबसे प्रसिद्ध और तथाकथित महान लोकतंत्र में ईरान-इराक़ वाला माहौल हो गया. यह जानते हुए भी कि हम इक्क्सवी शताब्दी की भारत के नागरिक हैं. ऐसे में एक बार तो देखना बनता था.

पद्मावत के “घूमर” गाने के दौरान रानी के किरदार में दीपीका पादुकोण

सत्योत्तर के समय में, हम सब के पास एक एक नैरटिव है. और जो अब सिनेमा को लेकर काफी मजबूत हो गया है. एक स्कूल बस पर पत्थर चले. अस्मिता, जो बहुत सरलता से कलुषित हो जाती है, उसके बचाव के लिए आंदोलन करना. जातीय समीकरण देखते हुए सरकारों को ब्लैकमेल कर लेना. हार्दिक से लेकर वसुंधरा तक बहुत आसान है. भारतीय राष्ट्रीय सेना से बड़ी और डेडिकेटेड सेनाएँ एक दिन में पैदा हो सकती हैं. और राज्यों में प्रशासनिक महकमे तुरंत ही फ़ेल भी.

भंसाली की “साँवरिया” एक फ़ेल्ड पोयम लगी थी. जैसे नवाज़ की “हरामखोर” एक कल्ट हो सकती थी. पर उतनी उठी नहीं. ” “गुज़ारिश” की क्या गुज़ारिश थी पता नहीं. और राम-लीला, रोमीओ-जूलीएट तो नहीं ही थी. विशाल के अलावा और किसी ने पोस्ट माडर्न इंटर्प्रेटेशन शेक्सपीयर का शायद नहीं किया देश में. कुरुसावा की फ़िल्म की ख़ैर चर्चा ना करें.

भंसाली अपने को आर्टिस्ट मानते हैं और इसका उनको पूरा हक़ है. देवदास से यहाँ तक आते- आते. उनको रंगों और भव्यता से प्रेम है, यह स्थापित हो जाता है. दुःख बस इतना है कि सिर्फ़ इतने से सिनेमा नहीं बन जाता. यह पूरी पटकथा बहुत से बहुत जायसी के लिखे से कुछ-कुछ प्रभावित है. वहाँ जो कहानी घटती है, उस से यहाँ कोई लेना देना नहीं है. पद्मावती दिल्ली जा सकती है. और ख़िलजी और रत्नसेन शतरंज खेल सकते हैं. दृश्यों की भव्यता, कई बार बाहुबली की ओर इशारा करती हैं. पर वहाँ तक नहीं पहुँचती.

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रणवीर सिंह ने अभिनय अच्छा किया है पर फ़िल्म इतनी स्लो हो जाती है कई बार और कई दृश्य इतने ग़ैर-ज़रूरी कि ये अच्छाइयां थोड़ी हो जाती हैं. डेढ़ घंटे तक में आपका धैर्य स्वर्ग सिधार जाए. इतनी धीमी. फ़िल्म आप और मुझ तक पहुंचने तक में कटने लगती है. जो देखी, उस से निर्देशक क्या संदेश देना चाहते हैं समझ में नहीं आता. क्योंकि रंगों और दीपों का इम्पैक्ट हल्का हो जाता है ढाई से ज़्यादा घंटे में. क्योंकि कहानी बिखरी सी लगती है, एक जैसा ही कुछ होता हुआ, बिना आश्चर्य-बिना रोमांच. क्योंकि हर तीसरी लाइन में लिखने वाले ने “राजपूत” शब्द लिखा है, जो कि एक समय के बाद इरिटेट करने लगता है. क्योंकि ख़िलजी की क्रूरता का पोट्रेयल एकतरफ़ा और पूर्वाग्रह ग्रसित लगता है कई बार.

फ़िल्म आख़िर है क्या? आप बार-बार यही सवाल करते हैं? इतिहास तो यह नहीं है. ना जो लिखित साहित्य है उस पर आधारित कुछ. पर पद्मावत इतिहास कतई नहीं हो सकता है. यह सिर्फ़ एक कहानी हो सकती है. निर्देशक/पटकथा लेखक के दिमाग़ से उपजी. और यहीं इसका आउटडेटेड होना तय हो जाता है. जिस समय खंड में कहानी घटित होती है तब जातीय विभाजन सच्चाई था. तब महिला शोषण, सती, जौहर सब समाज के अंग थे. पर यह कोई इतिहास पर बनी डॉक्युमेंटरी नहीं थी. ना किसी कविता का दृश्यांकन. सभी दर्शक इक्कीसवीं शताब्दी के हैं. पद्मावत को फ़ेल्ड पोयम कहा जा सकता था. यदि खिलजी में शिद्दत दिखाई देती और काश रतनसेन और पद्मावती में कुछ ऊष्णता. ध्यान रहे, सिर्फ़ बोल्ड दृश्य ही ऊष्णता नहीं लाते.

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दो सवाल बचते हैं. पहला, भंसाली जो बनाना चाहते थे वह यही था? दूसरा, करणी सेना, जिसने पूरे देश में बवाल मचा दिया, जिसके चलते राजस्थान सरकार न्यायालय चली गयी, क्या उन्होंने भंसाली से यह फ़िल्म बनवा ली? गड़बड़ कहाँ हुई, यह सोचना भी ज़रूरी है क्योंकि अब देश में एक ग़लत परम्परा शुरू हो गयी है. लाठी के ज़ोर पर अपने मन का करने की. उपाय कुछ नहीं.
फ़िल्म शुरू होने के कुछ देर बाद, ख़िलजी के धोखे पर मेरे बग़ल में बैठा राजपूत मित्र मुसलमानों को गाली देने लगा और “राजपूत” वाले डायलॉग आते ही जय भवानी चिल्लाता. वह अच्छा आदमी है, हम सब जानते हैं, पर जिनका रोज़गार उन्माद है, उन्होंने अपनी दुकानों की भीड़ बढ़ा ली है. ज़िम्मेदारी किसकी बनती है?

DPILLAR