अकबर का शिकारी “संग्राम” जिसने जीत लिया चितौड़गढ़ का किला

History की Mystery स्टेटक्राफ्ट

Team dpillar : 23 फरवरी 1568 ईसवी, चित्तौड़ के मजबूत किले ने मुगल बादशाह अकबर के सामने घुटने टेक दिए. चार महीने के घेराव के बाद चित्तौड़ का किला अकबर के कदमों में था. हाथी पर सवार मुगल बादशाह अकबर ने फिल्मी अंदाज में चित्तौड़ के किले में एंट्री ली. इस थका देने वाली लड़ाई में अकबर की पंसदीदा ‘संग्राम’ बंदूक ने वो कर दिखाया जो हजारों सैनिक, गोला- बारूद ना कर पाया. संग्राम बंदूक ने राजपूतों के इतिहास को हमेशा हमेशा के लिए बदल दिया.

अकबर का शिकारी संग्राम

मुगल बादशाह अकबर को बंदूकों का बहुत शौक था, वो एक बेहतरीन निशानेबाज था. ये वो समय था जब बंदूकों को आग देने की जरूरत नहीं पड़ती थी. अकबर कईं हजारों बंदूकों में से हजार बंदूकों को अपने खास इस्तेमाल के लिए चुनता था. इन बंदूकों में मुगल बादशाह अकबर की सबसे पंसदीदा बंदूक ‘संग्राम’ थी. जंग से इतर अकबर जब भी शिकार पर जाता था वो अपनी पंसदीदा ‘संग्राम’ बंदूक को ही लेकर जाता था.  उन दिनों हर बंदूक से हुए शिकार को दर्ज किया जाता था. कहते हैं अकेले ‘संग्राम’ बंदूक से एक हजार उन्नीस जानवर शिकार हुए

चित्तौड़ की लड़ाई

चित्तौड़ की लड़ाई अकबर ने खुद लड़ी थी. अक्टूबर 1567 का महीना था जब अकबर ने चित्तौड़ के किले के पास शाही खेमा लगाया. महीने भर के अंदर चित्तौड़ किले की घेराबंदी कर दी गई. चित्तौड़ का किला पहाड़ी पर था और मुगल बादशाह अकबर की फौज नीचे जमीन पर. अकबर की फौज को चित्तौड़ फतह के लिए नीचे से ऊपर की तरफ बढ़ना था. जब तेजी से अकबर की फौज ने सीधे चढ़ाई शुरू की तो राजपूतो ने उसकी फौज के कई सौ सैनिकों को मार गिराया, एक हमले में तो अकबर भी बाल बाल बचे. उस हमले में अकबर के बीस करीबी लोग मारे गए. कई महीनों तक दोनों सेनाएं एक दूसरे पर गोलीबारी करती रही. महीनों की इन हलचलों से राजपूतों में खलबली मच गई.

साल 1567 में राणा सांगा के बेटे उदय सिंह चित्तौड़ के महाराणा थे. अकबर के आने की खबर मिलते ही महाराणा ने जयमल को किले की जिम्मेदारी दी और खुद अपने खानदान और पांच हजार राजपूतों के साथ पहाड़ी इलाको में चले गए. अब चित्तौड़ किले की रक्षा का जिम्मा जयमल पर था. जयमल ने अकबर की फौज को सख्ती से जवाब दिया.

संग्राम का ऐतिहासिक निसाना

इसी गोलाबारी के बीच एक रोज अकबर की ‘संग्राम’ बंदूक ने वो किया कि  बंदूक बिरादरी में उसका कद आसमां बेतरह बढ़ गया. अकबर एक रात अपनी फौज का जायजा ले रहे थे. रात के अंधेरे में मुगल बादशाह अकबर ने चित्तौड़ के किले पर ‘हजार मेखी’ पहने एक शख्स को देखा. हजार मेखी यानि हजार कीलों वाला बख्तर, मानो एक आदमी किले की दीवार पर खड़ा चमक रहा हो. अकबर ने उस चमक रहे शख्स पर गोली चलाने के इरादे से जैसे ही अपनी पंसदीदा संग्राम ‘बंदूक’ को उठाया वैसे ही वो शख्स गायब हो गया. अकबर अपनी बंदूक कंधे पर टिकाए वहीं खड़ा रहा जैसे उसे यकीं था कि वो हजार मेखी शख्स फिर से आएगा. वो रात अकबर की रात थी. चित्तौड़ किले का जायजा ले रहा वो चमकदार शख्स फिर से अकबर के निशाने पर आ गया. अकबर ने बिना ये जाने कि वो कौन है उस पर गोली चला दी. अभी घंटा भर भी नहीं हुआ था कि चित्तौड़ की फौज गायब हो गई. किले में कई जगह से आग की लपटों के उठने की खबर आनी शुरु हो गई. ये लपटें सिर्फ आग की लपटें नहीं थी, किले में जौहर होने लगा था. जब हार तय होती है, और मर्द मारे जाते हैं तो औरतें चिता में समा जाती हैं. अगली सुबह होते होते पता चला कि अकबर की बंदूक संग्राम ने चित्तौड़ के किलेदार जयमल को अपना निशाना बना लिया था. चार महीने के घेराव के बाद जाकर चित्तौड़ का किला अकबर के कदमों में आ गया.

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